सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
अशक्याः परिसङ्ख्यातुं नामभिः कर्मभिस्तथा ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
अशक्याद्विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
अशक्यान्येव सङ्ख्यातुं भुजगानां तपोधन ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अशक्याश्चैव ये केचित्पृथिव्यां शूरमानिनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
अशक्येऽपि व्रजामेति धनञ्जय़दिदृक्षय़ा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
अशक्यो ह्यसहाय़ेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वय़ा ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अशक्योऽद्य त्वय़ा राजन्विनिवर्तय़ितुं वलात् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अशक्योऽर्थः समारव्धो नैतद्वुद्धिकृतं तव |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अशक्योऽय़ं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं यय़ुः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अशक्यौ सुनय़ात्तस्मात्सम्प्रधर्षय़ितुं वलात् ||
११३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अशङ्कत महाप्राज्ञस्तं कदाचिद्ददर्श ह ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
अशङ्कमानः कल्याणि सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
अशङ्कमानेन हुतस्तेनातुष्यद्धुताशनः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
अशङ्कमानैस्तत्कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अशङ्कमानो वचनमनसूय़ुरिदं शृणु |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अशङ्कितैः पक्षिगणैः प्रगीतैरिव च प्रभो ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
अशनिं गृह्य तरसा वज्रमस्त्रमवासृजत् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चाय़ुधी महान् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अशनीश्च महानादा मेघवर्हिणलक्षणाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
अशपत्तमपि क्रोधाद्भागिनेय़ं स मातुलः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अशरण्यः प्रजानां यः स राजा कलिरुच्यते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
अशरीरं शरीरे स्वे निरीक्षेत निरिन्द्रिय़म् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
अशरीरस्य दृश्येत विषय़ांश्च व्रवीहि मे ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अशरीरा महानादाः श्रूय़न्ते स्म तदा नृप ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अशरीरो वभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
अशव्दस्पर्शरूपं तदरसागन्धमव्ययम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
अशस्त्रं पुरुषं हत्वा सशस्त्रः पुरुषाधमः |
८६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अशानैनमिति ||
७१ 5
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अशामय़न्महाप्राज्ञो व्रह्मास्त्रेणैव भारत ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
अशाश्वतं हि लोकेऽस्मिन्सर्वं स्थावरजङ्गमम् ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
अशाश्वतमिदं सर्वं चिन्त्यमानं नरर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
अशाश्वतीः शाश्वतीश्च समाः पापेन कर्मणा ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अशास्त्रदृष्टमेतद्धि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अशास्त्रलक्षणो राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
अशास्यानपि शास्त्येष रक्षोवन्धुषु राजसु |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अशिक्षन्त धनुर्वेदं रौरवाजिनवाससः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
विभीषण उवाच
अशिक्षितं च भगवन्व्रह्मास्त्रं प्रतिभातु मे ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
अशिल्पजीवी नगृहश्च नित्यं; जितेन्द्रिय़ः सर्वतो विप्रमुक्तः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
अशिवः शिवसङ्काशो मृतो जीवन्निवाटसि ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अशिवाभिः शिवाभिश्च नादितं गृध्रसेवितम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
अशिवाश्च शिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
अशिवेनातिवामोरूरजस्रं नेत्रवारिणा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
अशिशुः शिशुरूपेण यावद्व्रह्मा न वुध्यते ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अशिष्टनिग्रहो नित्यं शिष्टस्य परिपालनम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
धृतराष्ट्र उवाच
अशिष्टवदमर्यादः पापैः सह दुरात्मभिः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
अशिष्टवदमर्यादो मानी मान्यावमानिता ||
२६ ख