भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
सूर्यस्य तपतो लोकानग्नेः सोमस्य चाप्युत |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सूर्यस्य तपतो लोकान्निर्मिता ये पुरःसराः |
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
सूर्यस्य भासा धनदस्य लक्ष्म्या; शौर्येण शक्रस्य वलेन विष्णोः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
सूर्यस्य सदने चाहं निक्षिप्येदं कलेवरम् |
५७ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
सूर्या यत्र च सौवर्णास्त्रय़ो भासन्ति दंशिताः |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
सूर्या यस्मिंस्तु सौवर्णाः प्रभासन्ते प्रभासिनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
देवा ऊचुः
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं रोद्धुमिच्छन्परन्तप ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमे |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
सूर्याचन्द्रमसौ चैव नक्षत्राणि च सर्वशः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्याचन्द्रमसौ वाय़ुः पृथिवी वह्निरेव च ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
सूर्याचन्द्रमसौ वाय़ुर्भूमिरापोऽग्निरेव च |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्याचन्द्रमसौ व्योम्नि चतुर्दश्यामिवोदितौ ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत्केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्याच्च कुन्तिकन्याय़ां जज्ञे कर्णो महारथः |
८२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
सूर्यादः सूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ||
२८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सूर्यानुगामिभिस्तात ऋषिभिस्तैर्महात्मभिः |
१०९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
सूर्यारुणौ यथा दृष्ट्वा तमो नश्यति मारिष |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
सूर्यास्तमनवेलाय़ां प्रभग्नं विद्रुतं दिशः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
सूर्यास्तमय़मिच्छन्तस्त्वरमाणा महारथाः ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
सूर्यास्तमय़मिच्छन्तो लोहिताय़ति भास्करे ||
४३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सूर्यास्तमय़वेलाय़ामासेदुः सुमहद्वनम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
सूर्ये चक्षुः समाधाय़ प्रसन्नं सलिले मनः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सूर्ये चास्तमनुप्राप्ते रजसा चाभिसंवृते |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यवर्तत भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
नाग उवाच
सूर्येण सहितो व्रह्मन्पृथिवीं परिवर्तते ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
सूर्येणाभ्युदितो यश्च व्रह्मचारी भवत्युत |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
द्रोण उवाच
सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो; भूमेरम्भो भूमिजातान्रसांश्च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
सूर्योदय़ इवावश्यं ध्रुवं तस्य पराभवः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़नमिच्छन्तः स्थिता युद्धाय़ दंशिताः ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े को हि विमुक्तसंशय़ो; गर्वं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
सूर्योदय़े को हि विमुक्तसंशय़ो; भावं कुर्वीताद्य महाव्रते हते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
सूर्योदय़े द्वितीय़ं सा भर्तारं वरय़िष्यति |
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े महत्सैन्यं कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े महाराज ततो युद्धमभून्महत् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े महाराज पुनर्युद्धाय़ दंशिताः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े महावाहुर्दिवसश्चातिवर्तते |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्योदय़े यस्तु समाहितः पठे; त्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चय़ान् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
सूर्योदय़े युक्तसेनः प्रतीक्ष्य; ध्वजी रथी रक्ष च सत्यसन्धम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
सूर्योदय़े सञ्जय़ के नु पूर्वं; युय़ुत्सवो हृष्यमाणा इवासन् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
सृक्किणी लेलिहानस्य वाष्पमुत्सृजतो मुहुः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सृक्किणी विलिहन्वीरः पशुमध्ये वृको यथा |
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
सृक्किणी विलिहन्वीरः शार्दूल इव दर्पितः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सृक्किणी संलिहन्राजन्क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
सृक्विणी लेलिहन्वीरः क्रोधसंरक्तलोचनः ||
७ ख