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उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुं च वृकोदरं च; धनञ्जय़ं माद्रवतीसुतौ च |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रुं च सभाजय़ेथा; दिष्ट्यानघ ग्राममुपस्थितस्त्वम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय १८३
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्च; उपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
अजातशत्रुं राजानं द्रष्टुमिच्छामि केशव ||
६६ ख
विराट पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुं ह्रीमन्तं तं च भ्रातॄननुव्रतम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुः कौन्तेय़ः सात्वतं प्रत्यभाषत ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुः कौन्तेय़ो माद्रीपुत्रावुभावपि ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुः कौन्तेय़ो हृष्टोऽभूत्सह सोदरैः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुः पृथिवीतलस्थः; शेते पुरा राङ्कवकूटशाय़ी ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुः समरे महात्मा; शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुः स्वान्वीरानिदं वचनमव्रवीत् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुणा तेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुता सत्या तस्य यत्स्निह्यते भवान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुमानर्चुः पुरन्दरमिवर्षय़ः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुमामन्त्र्य कुन्ती वचनमव्रवीत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुमासीनं भ्रातृभिः सहितं वने |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुरप्यद्य भीमार्जुनवशानुगः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुर्धर्मात्मा शुद्धजाम्वूनदप्रभः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुर्मद्राणामृषभेण यशस्विना |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो; धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १८३
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः; पप्रच्छ कृष्णं कुशलं निवेद्य |
६ क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुस्तान्योधान्भीमं त्रातेत्यचोदय़त् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुस्तु विहाय़ पापं; जीर्णां त्वचं सर्प इवासमर्थाम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संय़ुगे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रो धर्मेण कृत्स्ना ते वसुधा जिता |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रो भद्रं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रो भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
अजातशत्रो सेवस्व धर्म एष सनातनः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रोः क्रुद्धस्य पुत्रस्य तव चाभवत् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
अजातशत्रोर्नृपतेर्द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवाप्रिय़ं भवेत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २३२
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रोर्वचनं तच्छ्रुत्वा तु धनञ्जय़ः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
अजातशत्रोश्च हितं हितं च; दुर्योधनस्यापि तथैव राज्ञः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या; दुःशासनो यत्परुषाण्यवोचत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अजातश्मश्रवो धीरास्तथान्ये वनवासिनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
अजातश्मश्रवो मन्दाः कुले जाताः प्रवव्रजुः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अजाते त्वय़ि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वय़म्भुवा ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
अजानत इवाख्यासि संस्तुवन्कुरुसत्तम |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
अजानतस्ते राधेय़ नाभ्यसूय़ाम्यहं वचः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
अजानता कृतमिदं मय़ेत्यथ तमव्रुवम् |
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
अजानता भवेत्कश्चिदपराधः कृतो यदि |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
अजानता महिमानं तवेदं; मय़ा प्रमादात्प्रणय़ेन वापि ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अजानता मय़ा सङ्ख्ये राज्यलुव्धेन घातितः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
अजानता मय़ाकार्यमिदमद्य कृतं मुने |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
अजानता व्रतमिदं कृतमेतदसंशय़म् ||
२६ ख