chevron_left  अश्वत्थामाarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा कृपश्चैव त्रिगर्ताधिपतिस्तथा |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा कृपश्चैव शीर्षमास्तां यशस्विनौ |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वय़मेव च सैन्धवः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वय़मेव च सैन्धवः ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा कृपो द्रोणः सैन्धवश्च जय़द्रथः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
अश्वत्थामा कृपो द्रोणो द्यूतं नेच्छन्ति सञ्जय़ ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा च भोजश्च मागधश्च महावलः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
अश्वत्थामा च भोजश्च सर्वशस्त्रभृतां वरौ |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनुर्धरौ |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा च विंशत्या कृतवर्मा च सप्तभिः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
नारद उवाच
अश्वत्थामा च विक्रान्तो भग्नसैन्या दिशो गताः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा च शल्यश्च वृषसेनः कृपस्तथा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धः शिखण्डिनमवस्थितम् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धः समाय़ाद्रथसत्तमः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धो निमेषार्धाच्छिखण्डिनः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धो वारय़ामास भारत ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततः शल्यः काम्वोजश्च सुदक्षिणः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध दशभिः शरैः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादस्त्रभृतां वरः ||
९० ग
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम् |
८३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तथाष्टौ च परीप्सन्पितरं रणे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तथोक्तस्तु तव पुत्रेण मारिष |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा तु तत्कर्म हृदय़ेन महात्मनः |
६६ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु तद्राजन्निशम्य वचनं मम |
५८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु तौ दृष्ट्वा यत्नवन्तौ महारथौ |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु सङ्क्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु सङ्क्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु समरे सात्यकिं नवभिः शरैः |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य ताञ्शरौघान्निरर्थकान् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु हार्दिक्यमपोवाह यशस्विनम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा धृष्टकेतुः प्रद्युम्नो रुक्मिरेव च ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा पितुर्मानं कुर्वाणः प्रत्यषेधय़त् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा पृष्ठतोऽभूत्काम्वोजैः परिवारितः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
अश्वत्थामा मद्रराजः कृपः कर्णश्च सङ्गताः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा महाराज दुःखशोकसमन्वितः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा महाराज भूय़ोऽर्जुनमय़ोधय़त् ||
७७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा महाराज व्यचरत्कृतहस्तवत् ||
१०४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षक्षय़ङ्करः |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीय़स्तवानघ |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
अश्वत्थामा यथा मह्यं तथा श्वेतहय़ो मम |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा यय़ौ यत्तः सिंहलाङ्गूलकेतनः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च आवन्त्यश्च वृहद्वलः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च युय़ुत्सुश्च महारथः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सैन्धवश्च जय़द्रथः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तश्च वाह्लिकः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ वाह्लिकः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ वाह्लिकः ||
१९ ख