chevron_left  अश्वत्थामाarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ सैन्धवः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा शान्तनवः सैन्धवोऽथ जय़द्रथः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवय़त् ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा समुद्वीक्ष्य पुनर्वचनमव्रवीत् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा सुसंय़त्तः कृष्णावभ्यद्रवद्रणे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा सुसङ्क्रुद्धः सन्धाय़ोग्रमजिह्मगम् |
१३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा सोमदत्त आवन्त्यौ च महारथौ |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
अश्वत्थामा हत इति कुञ्जरे विनिपातिते |
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
अश्वत्थामा हत इति तच्चावुध्यत ते पिता ||
११३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा हत इति शव्दमुच्चैश्चकार ह ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अश्वत्थामा हते कर्णे किमभाषत सञ्जय़ ||
९६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा हतो व्रह्मन्निवर्तस्वाहवादिति ||
१०२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमष्टाभिर्विव्याध पुरुषर्षभ ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमासाद्य तदा वाक्यमुवाच ह ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ||
६१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमासाद्य शरवर्षैरवाकिरत् ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
अश्वत्थामानमाहेदं हतः कुञ्जर इत्युत |
११५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमाय़स्तो भैमसेनिरभाषत ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमुक्त्वैवं ततः सौवलमव्रवीत् |
८२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अश्वत्थामापि चात्रैव द्रोणे युधि निपातिते |
१६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामाप्यपाय़ासीत्पाण्डवेय़ाद्रथान्तरम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामाभिरूपाय़ गृहानतिथय़े यथा ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामेति विख्यातः कथं तेन समागमः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामेति विख्यातो गजः शक्रगजोपमः ||
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
अश्वत्थामेति सोऽद्यैष शूरो नदति पाण्डव ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामेति हि गजः ख्यातो नाम्ना हतोऽभवत् |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामैव वालोऽय़ं तस्मान्नाम्ना भविष्यति ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्नः पुनर्वाणाः क्षिप्रमभ्यस्यतो रणे |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नः शरानस्तांश्छित्त्वैकैकं त्रिधा त्रिधा |
३५ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
अश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापश्चान्योन्यकारितः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नः सनामानं हत्वा नागं सुदुर्मते |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महावलः |
९० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नश्च सङ्कल्पाद्धताः कर्णेन सृञ्जय़ाः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
धृतराष्ट्र उवाच
अश्वत्थाम्नस्तथा तात शूराणां सुमहात्मनाम् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
अश्वत्थाम्नस्तथा भीष्म न चैतौ स्तोतुमिच्छसि ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नस्तु चिक्षेप भैमसेनिर्जिघांसय़ा ||
४१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्ना च पापेन हतं वः शिविरं निशि ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातृणां शतमूर्जितम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अश्वत्थाम्ना मणिरत्नं च दत्तं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थाम्ना हतो जातस्तमुज्जीवय़ केशव ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नि कृपा तेऽस्ति कृपे चाचार्यगौरवात् ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नि कृपे चैव तथैव कृतवर्मणि |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नि च कौरव्य निधनं सैन्धवोऽगमत् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
अश्वत्थाम्नि यथा पुत्रे भूय़ो मम धनञ्जय़े |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम |
१११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थाम्ने च नकुलं शैव्यं च कृतवर्मणे |
६ क