आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीं मम |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
कुलीनाः पूजिताः सम्यग्विजय़न्तीह शात्रवान् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
कुलीनाः संमताः प्राज्ञाः सुखं प्राप्स्यन्ति पाण्डवाः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
कुलीनाः सत्त्वसम्पन्ना युक्ताः सर्वेषु कर्मसु ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
कुलीनान्सचिवान्कृत्वा वेदविद्यासमन्वितान् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कुलीनान्सत्यसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कुलीनाश्चानुरक्ताश्च कृतास्ते वीर मन्त्रिणः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
कुलीनैः सह शक्येत कृत्स्नां जेतुं वसुन्धराम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
कुलूतवासिनं राजन्वृहन्तमुपजग्मिवान् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
कुलूतानुत्तरांश्चैव तांश्च राज्ञः समानय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
कुले जतस्य वीरस्य क्षत्रिय़स्य विशेषतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं धैर्यमेव च |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिष्ठिताः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृध्यतः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
कुले जातस्य शूरस्य परवित्तेषु गृध्यतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
कुले जातो धर्मगतिस्तपोविद्यापराय़णः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
कुले जातो धर्मवान्यो यशस्वी; वहुश्रुतः सुखजीवी यतात्मा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
कुले तव तथैवास्तु गुणकेशी सुमध्यमा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम् ||
१८२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
कुले प्रीतिं मातृतश्च प्रसादं; शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कुले महति जातासि क्षत्रिय़ाणां महात्मनाम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कुले महति जातास्मि दिव्येन विधिना किल |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कुले महति जातेन ह्रीमता दीर्घदर्शिना |
१७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
कुले महति विख्याते विशिष्टां वृत्तिमास्थितः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
कुलेन च विशिष्टोऽसि वय़सा च श्रुतेन च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरुपेक्षिताः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
कुलेषु जाता ह्रीमत्यः कृष्णपक्षाक्षिमूर्धजाः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
कुलेषु जाताः कल्याणि व्यसनाभ्याहता भृशम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
कुलेषु तेषु जाय़न्ते गुरुवृद्धापचाय़िनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
कुलेषु पापरक्षांसि जाय़न्ते वर्णसङ्करात् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
कुलैश्वर्यश्रुतिवलैर्दृप्तः शल्योऽव्रवीदिदम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
कुलोचितमिदं कर्म पितृपैतामहं मम |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
कुलोद्द्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति |
५३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
कुल्यानि तेषां संय़ोज्य तदाचख्युर्महीपतेः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कुल्याय़ां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
कुवलाश्व इति ख्यात इक्ष्वाकुरपराजितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्तु नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्तु पितृतो गुणैरभ्यधिकोऽभवत् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु तस्मिन्वै वालुकार्णवे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो वलशालिनाम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
कुवेर इव यक्षाणां मरुतामिव वासवः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेर इव यक्षाणां मरुतामिव वासवः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
कुवेरं सर्वय़क्षाणां धनानां च प्रभुं तथा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरः समनुप्राप्तो यक्षैरनुगतः प्रभुः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
कुवेरः सर्वय़क्षाणां क्रतूनां विष्णुरुच्यसे ||
१५५ ग