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शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
अश्वस्तनोऽथ कापोतीमाश्रितो वृत्तिमाहरेत् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं; न्यस्तं हविर्धानमिवोत्तरेण ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वस्येवास्य यत्स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
अश्वा नाश्वैरय़ुध्यन्त न गजा गजय़ोधिभिः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्च चतुरः श्वेतान्निजघ्ने निशितैः शरैः ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्च चतुरो भल्लैरनय़द्यमसादनम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वांश्च दिव्यानिच्छेय़ं पाण्डुरान्वातरंहसः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्च वहुधा पश्य शोणितेन परिप्लुतान् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
अश्वांश्चाश्वय़ुजे वेत्ति भरणीष्वाय़ुरुत्तमम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्चास्यावधीत्तूर्णं सारथिं च महारथः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्चास्यावधीद्राजन्नुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
अश्वांश्चैतान्यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
अश्वांस्तथा वेगवतो यदय़त्नादधारय़त् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अश्वांस्तस्यावधीत्तूर्णमुभौ च पार्ष्णिसारथी ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
दुर्योधन उवाच
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान्रत्नानि विविधानि च ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
अश्वांस्तित्तिरिकल्माषांस्त्रिशतं शुकनासिकान् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
अश्वांस्तित्तिरिकल्माषान्गान्धर्वान्हेममालिनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वांस्त्रिवेणुं तल्पं च तिलशोऽभ्यहनन्रथम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अश्वाः शशाङ्कसदृशाश्चन्द्रदेवमुदावहन् ||
५० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
अश्वाः शोणाः प्रकाशन्ते वृहन्तश्चारुवाहिनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
अश्वागारान्गजागारान्वलाधिकरणानि च ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य साय़कैः |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
अश्वाञ्जघान सहसा तथोभौ पार्ष्णिसारथी |
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अश्वाञ्जाम्वूनदैर्जालैः प्रच्छन्नान्वातरंहसः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अश्वातकैर्विकर्णैश्च तथा शर्मिलकोसलैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
अश्वानग्र्यान्पाण्डुराभ्रप्रकाशा; न्पुष्टान्स्नातान्मन्त्रपूताभिरद्भिः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अश्वानस्यावधीद्भोजो गौतमः पार्ष्णिसारथी |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
गालव उवाच
अश्वानां काङ्क्षितार्थानां षडिमानि शतानि वै |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
अश्वानां कुञ्जराणां च रथानां चातिवर्तताम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
अश्वानां च सहस्रे द्वे राजन्काञ्चनमालिनाम् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
नकुल उवाच
अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनय़ं चापि सर्वशः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अश्वानां रेणुकपिलै रुक्मच्छन्नैरुरश्छदैः |
७० क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
अश्वानां श्यामकर्णानां सहस्रेण स मुच्यते ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
अश्वानां हेषमाणानां गजानां चैव वृंहताम् |
६१ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वानां हेषितं श्रुत्वा का प्रशंसा भवेत्परे |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अश्वानामय़ुतेनैव तथान्यैश्च महारथैः ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
अश्वानृश्यसवर्णांस्तु हंसवर्णैर्हय़ोत्तमैः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अश्वान्गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलङ्कृताः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अश्वान्मनोजवांश्चास्य कल्माषान्वीतकल्मषः |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अश्वान्राजन्मनुष्यांश्च रजसा संवृते सति ||
४८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
अश्वान्वै चतुरो राजंश्चतुर्भिः साय़कोत्तमैः |
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अश्वान्व्यद्रावय़द्वाणैर्हतसूतान्महात्मनः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अश्वारोहवरांश्चापि पातय़ामास भारत |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
अश्वारोहा गजारोहा रथिनोऽथ पदातय़ः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अश्वारोहा महाराज धावमानास्ततस्ततः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अश्वारोहाः समासाद्य त्वरिताः पत्तिभिर्हताः |
३६ ख