chevron_left  शरांस्तान्मृत्युसंस्पर्शान्सात्यकेस्तुarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
शरांस्तान्मृत्युसंस्पर्शान्सात्यकेस्तु पदानुगाः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
शरांस्तु पञ्च ज्वलितानिवोरगा; न्प्रवीरय़ामास जिघांसुरच्युते ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शराः कुर्वन्ति ते नार्थं पार्थ काद्य विडम्वना ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
शराः समभिसर्पन्तु वल्मीकमिव पन्नगाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
शराग्निधूमे रथनेमिनादिते; धनुःस्रुवेणास्त्रवलापहारिणा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
शराचितशरीरं हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
शराचिताङ्गः सौभद्रः श्वाविद्वत्प्रत्यदृश्यत ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शराणां च शतेनाश्वानविध्येतां मुदान्वितौ ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
शराणां च सहस्रेण पुनरेनं समुद्यतम् |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
शराणां त्वरितो द्रोणः षड्विंशत्या समर्पय़त् ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
शराणां पुङ्खसक्तानां मौर्व्याभिहतय़ा दृढम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
शरातिसर्गे शीघ्रत्वात्कालान्तकय़मोपमः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
शरातुरास्तथैवान्ये दन्तिनो विद्रुता दिशः ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
शरानर्पय़ितुं कश्चित्कवचे तव शक्ष्यति ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शरानादाय़ तीक्ष्णाग्रान्मर्मभेदप्रमाथिनः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षणः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
शरानुपादाय़ विषाग्निकल्पा; न्विव्याध राजानमदीनसत्त्वः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
शरान्दीप्ताग्निसङ्काशान्मुमोच तनय़े मम ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
शरान्धकारं वहुधा कृतं तत्र समन्ततः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
शरान्धकारे तु महात्मभिः कृते; महामृधे योधवरैः परस्परम् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
शरान्पञ्चाशतस्तांस्तु शैनेय़ः कृतहस्तवत् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
शरान्मुमुचतुस्तूर्णमिरावति महात्मनि ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
शरान्मुमोच ज्वलितान्दीप्तास्यानिव पन्नगान् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
शरान्विचित्रान्महतो रुक्मपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
शरान्विसृजतोस्तूर्णं साधु साध्विति पूजय़न् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
शरान्व्यसृजतां शीघ्रं तोय़धारा घनाविव ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
शरान्सप्त महेष्वासः कौन्तेय़ाय़ समर्पय़त् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
शराभिघातदुःखात्ते कच्चिद्गात्रं न दूय़ते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
शराभिघाताद्व्यथितं मनो मे मधुसूदन |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
शराभितप्तकाय़ोऽहं शरसन्तापमूर्छितः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
शराभ्यां च शतघ्नीं तां राज्ञश्चिच्छेद भारत |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
शराम्वुधारौ समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरार्चिरदहत्क्रुद्धः पाण्डवाग्निर्धनञ्जय़ः ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
शरार्चिषं गाण्डिवचारुमण्डलं; युगान्तसूर्यप्रतिमानतेजसम् |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
शरार्चिषा गाण्डिवेनाहमेकः; सर्वान्कुरून्वाह्लिकांश्चाभिपत्य |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
शरार्ता न जुहुर्द्रोणं पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
शरार्ताश्च रणे योधा न कृष्णौ शेकुरीक्षितुम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
शरार्तैर्विद्रुतैर्नागैर्हृताः केचिद्दिशो दश ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
शरार्दितः सात्यकिना रथोपस्थे नरर्षभः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
शरार्दितः सात्वतेन मर्दमानः स्ववाहिनीम् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शरार्दिताश्च ग्लानाश्च हय़ा दूरे च सैन्धवः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
शरार्दितेन हि मय़ा प्रेक्षणीय़ो महाद्युतिः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरावभिन्नैः पतितैश्च वाजिभिः; श्वसद्भिरन्यैः क्षतजं वमद्भिः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
शरावरणपक्षान्ते प्रजहार जय़द्रथः ||
६६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
शराश्च क्षय़मापन्नाः क्षणेनैव समन्ततः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शराश्च दैत्यकाय़ेषु पिवन्ति स्मासृगुल्वणम् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
शराश्च निशिताः पीता निश्चरन्ति स्म संय़ुगे |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शराश्चापानि खड्गाश्च शरीराणि शिरांसि च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
शराश्चाशीविषाकाराः सम्भवन्त्यनुमन्त्रिताः ||
१० ख