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आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युय़ुत्सय़ा |
२३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
अष्टादश सहस्राणि योजनानां विशां पते |
५ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
अष्टादश सहस्राणि व्रातानां सन्ति नः कुले |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
अष्टादशगुणं यत्तत्सत्त्वं सत्त्ववतां वर |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम् ||
११६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अष्टादशसहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रिय़ैर्युद्धदुर्मदैः ||
५४ ग
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अष्टादशास्मिन्नध्याय़ाः पर्वण्युक्ता महात्मना |
१८९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अष्टादशाहेन हता दशभिर्योधपुङ्गवैः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अष्टादशे तु दिवसे प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
अष्टादशेमे राजानः प्रख्याता मधुसूदन |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अष्टादशैव चाध्याय़ा व्यासेनोत्तमतेजसा ||
९५ ग
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अष्टादशैवमेतानि पर्वाण्युक्तान्यशेषतः |
२३३ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेय़ानां महासुरः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारय़ेत् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
अष्टानुचरमेकैकमष्टौ दास्यामि केशवे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
अष्टापदपदस्थाने त्वक्षमुद्रेव न्यस्यते ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अष्टाभिः कृतवर्माणमविध्यत्परमेषुभिः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
अष्टाभिः सर्वमेधैश्च नरमेधैश्च सप्तभिः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अष्टाभिरष्टौ राधेय़ो न्यहनन्निशितैः शरैः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
अष्टाभिर्भरतश्रेष्ठ सूतमेकेन पत्रिणा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
अष्टाभिर्वाजिनोऽविध्यद्ध्वजं चैकेन पत्रिणा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
अष्टाभिश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं चरेत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत् ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
अष्टावक्रं पूजय़न्तोऽभ्युपेय़ु; र्विप्राः सर्वे प्राञ्जलय़ः प्रतीताः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
अष्टावक्रं पूजय़े पूजनीय़ं; यस्य हेतोर्जनितारं समेष्ये ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
युधिष्ठिर उवाच
अष्टावक्रः केन चासौ वभूव; तत्सर्वं मे लोमश शंस तत्त्वम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
अष्टावक्रः पथि राज्ञा समेत्य; उत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
अष्टावक्रः पितरं पूजय़ित्वा; सम्पूजितो व्राह्मणैस्तैर्यथावत् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
अष्टावक्रः समितौ गर्जमानो; जातक्रोधो वन्दिनमाह राजन् |
६ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
अष्टावक्रश्चैव कहोडसूनु; रौद्दालकिः श्वेतकेतुश्च राजन् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २२
भीष्म उवाच
अष्टावक्रस्तथेत्युक्त्वा प्रतिगृह्य च तां प्रभो |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
भीष्म उवाच
अष्टावक्रस्य संवादं दिशय़ा सह भारत ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अष्टावक्रीय़मत्रैव विवादे यत्र वन्दिनम् |
१२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २२
भीष्म उवाच
अष्टावक्रोऽन्वपृच्छत्तां रूपं विकुरुषे कथम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टावग्रे व्राह्मणानां सहस्राणि स्म नित्यदा |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टावजनय़त्पुत्रांस्तस्याममरवर्णिनः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि यदाय़ुधम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
अष्टाविंशतिरात्रं च चङ्क्रम्य सह भानुना |
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३४
उत्तर उवाच
अष्टाविंशतिरात्रं वा मासं वा नूनमन्ततः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
अष्टाविंशत्तु तान्वाणानस्तान्विप्रेक्ष्य निष्फलान् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अष्टावेते महेष्वासाः सुकुमारा यशस्विनः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
दुःषन्त उवाच
अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः |
८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टावेव हि दृश्यन्ते वसवो भरतर्षभ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि गन्धर्वाः शीघ्रचारिणः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि ते चापि विवुधैर्हताः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः |
३९ क