वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अष्टास्वेतेषु युक्तः स्याद्व्रतेषु निय़तेन्द्रिय़ः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
अष्टेमे वसवो देवा महाभागा महौजसः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शर्वस्य मे शृणु |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
अष्टौ कविसुता ह्येते सर्वमेभिर्जगत्ततम् |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपय़न्ति; प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
अष्टौ च षष्टिं च शतानि यानि; मनोविरुद्धानि महाद्युतीनाम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
अष्टौ चाङ्गिरसः पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृताः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
अष्टौ ज्ञानेन्द्रिय़ाण्याहुरेतान्यध्यात्मचिन्तकाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
अष्टौ तान्यथ शुक्रेण जानीहि प्राकृतानि वै ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पय़ः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टौ दंष्ट्राः सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्यापातदुःसहाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अष्टौ नागसहस्राणि सादिनामय़ुतानि षट् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
अष्टौ नृपेमानि मनुष्यलोके; स्वर्गस्य लोकस्य निदर्शनानि |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यतः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
अष्टौ प्रकृतय़ः प्रोक्ता विकाराश्चापि षोडश |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अष्टौ प्रकृतय़श्चैव प्रकृतिभ्यश्च यत्परम् |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
अष्टौ प्रसवजैर्युक्ता गुणैर्व्रह्मविदः शुभाः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
अष्टौ भूतानि भूतानां शाश्वतानि भवाप्ययौ ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
अष्टौ यं कुररच्छाय़ाः सदश्वा राष्ट्रसंमताः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अष्टौ यस्याग्नय़ो ह्येते न दहन्ते मनः सदा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागाय़ुतानि च |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च |
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
अष्टौ वसूञ्शुश्रुम देवतासु; यूपश्चाष्टास्रिर्विहितः सर्वय़ज्ञः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
अष्टौ शतानि मे देहि हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
अष्टौ शाणाः शतमानं वहन्ति; तथाष्टपादः शरभः सिंहघाती |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च ||
१६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भास्वरमूर्तय़ः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
अष्टौ सहस्राणि ककुद्मिनामहं; शुक्लर्षभाणामददं व्राह्मणेभ्यः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
असंमन्त्र्य मय़ा सार्धमतिभारोऽय़मुद्यतः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
असंमूढश्च यो नित्यं स राजवसतिं वसेत् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम् ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
असंमोहं पूजय़न्तोऽस्य सङ्ख्ये; सम्पश्यन्तो विजय़ं राक्षसस्य ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
असंमोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च संनतिः ||
५३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
असंमोहाय़ मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय़ च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
असंरोधेन धर्मस्य वृत्तिं लिप्सेदगर्हिताम् ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत वै द्विजः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
असंवासाः प्रजाय़न्ते म्लेच्छाश्चापि न संशय़ः |
१०८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
असंविभज्य क्षुद्राणां या गतिर्मृष्टमश्नताम् |
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
युधिष्ठिर उवाच
असंविहितराष्ट्रस्य देशकालावजानतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
असंवृतं तद्भवति ततोऽन्यदवदीर्यते ||
६० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
असंवृतानि गृह्णीय़ात्प्रवृत्तानीह कार्यवान् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
असंशय़ं कृतास्त्राश्च पर्याप्ताश्चापि वारणे ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
असंशय़ं केशव पाण्डवानां; भवान्गतिस्त्वच्छरणा हि पार्थाः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
असंशय़ं क्लेशितास्ते वने चेह च पाण्डवाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
असंशय़ं तथाभूते पाञ्चाल्यः साध्वमन्यत |
१३६ क