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वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
असङ्ख्येय़ा महाराज समीय़ू रामकारणात् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
असङ्ख्येय़ाः स्मृतास्तेषां पुत्राः पौत्राश्च भारत ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
असङ्ख्येय़ात्मभावज्ञ जय़ गम्भीर कामद ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
असङ्ख्येय़ानि चास्त्राणि तस्य दिव्यानि धीमतः |
१४० क
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
असङ्ख्येय़ास्तु कौन्तेय़ यक्षराक्षसकिंनराः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
असङ्ख्येय़ेति मत्वा तान्न व्रवीमि द्विजोत्तम ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
असङ्ख्येय़ोऽप्रमेय़ात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
असङ्गः श्रेय़सो मूलं ज्ञानं ज्ञानगतिः परा |
३ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
असङ्गी देवविहितस्तस्मिन्रथवरे ध्वजः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
असङ्गीन्यविवादीनि मनःशान्तिकराणि च ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भुवि विय़ोगजम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
असङ्गो रुद्रतनय़ो मनुज्येष्ठः शिवङ्करः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
असङ्घातरता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
असच्च सदसच्चैव यद्विश्वं सदसतः परम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ११३
विभाण्डक उवाच
असज्जनेनाचरितानि पुत्र; पापान्यपेय़ानि मधूनि तानि |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक्पृथक् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
असज्जन्त प्रजाः सर्वाः कामक्रोधवशं गताः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघाः प्रापतन्भुवि |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
असज्जमानं वृक्षेषु धूमकेतुमिवोत्थितम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
असज्जमानं वृक्षेषु शैलेषु विषमेषु च |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
असज्जमानः शान्तात्मा निर्विकारः समाहितः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
असज्जमानः सर्वेषु न कथञ्चन लिप्यते ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
असज्जमानश्च गतस्तरस्वी; वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
असञ्चय़ाः क्रिय़ावन्तस्तान्नमस्यामि यादव ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
असतश्च सतश्चैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
असता धर्मकामेन विशुद्धं कर्म दुष्करम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
असता यत्समाचीर्णं न स धर्मः सनातनः |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
युधिष्ठिर उवाच
असतां कीदृशं रूपं साधवः किं च कुर्वते |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
असतां तत्र जाय़न्ते भेदाश्च व्यसनानि च ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
असतां दर्शनात्स्पर्शात्सञ्जल्पनसहासनात् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
असतां प्रतिषेधश्च सतां च परिपालनम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
असतां विपरीता तु लक्ष्यते भरतर्षभ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव |
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
असतोऽपि गुणानाहुर्व्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
असत्कारः स सुमहान्मुहूर्तमपि तस्य तु |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
असत्कृत्य तु तत्सर्वं तत्रैवान्तरधीय़त |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
असत्त्वं सत्त्वमात्मानमतत्त्वं तत्त्वमात्मनः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३
भीष्म उवाच
असत्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
असत्यं वेदवचनं कस्माद्वेदोऽनृतं वदेत् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
असत्यपि कृते कार्ये नेह पन्नग लिप्यते |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
असत्यमेतत्संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
असत्यवचना नार्यः कस्ते श्रद्धास्यते वचः ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
असत्याः सत्यसङ्काशाः सत्याश्चासत्यदर्शिनः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
असत्यो लोकविद्विष्टः समय़े चानवस्थितः |
९ क