chevron_left  किरञ्शरशतान्येवarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतान्येव गौतमोऽनुय़यौ तदा ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतैरुग्रैर्धाराभिरिव पर्वतम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतैर्हृष्टस्तत्र नादो महानभूत् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरसहस्राणि तत्र तत्र प्रय़ाम्यहम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरसहस्राणि द्रोणमेवाभ्ययाद्रणे ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
किरञ्शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् ||
६७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
किरञ्शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरसहस्राणि सुप्रतीकशिरोगतः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरौघान्प्रय़यावलाय़ुधरथं प्रति ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
किरतां शरवर्षाणि स नागः पर्यवर्तत ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
किरतोः शरजालानि वृत्रवासवय़ोरिव ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
किरद्भिरिव तत्रस्थान्नागान्पुष्पाम्वुवृष्टिभिः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
किरन्तं शरवर्षाणि रोचमान इवांशुमान् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
किरन्तः शरवर्षाणि महान्ति दृढधन्विनः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
किरन्तमिषुसङ्घातान्रुक्मपुङ्खाननेकशः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
किरन्तमेव स शरान्ददृशे पाकशासनिः ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
किरन्ति च चितामेते जटिला व्रह्मचारिणः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान्साय़काँल्लघुवेधिनः ||
१८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
किरन्तो विविधान्वाणाञ्शस्त्राणि विविधानि च ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
किरन्तौ विविधान्वाणान्पितृव्यसनकर्शितौ ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
किरन्निषुगणांस्तिक्ष्णान्स्वरश्मीनिव भास्करः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
किरन्निषुगणान्घोरान्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
किरन्वाणगणान्राजञ्शतशोऽर्जुनमूर्धनि ||
३७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
किरन्समन्तात्सहसा शरान्वली; समापतच्छ्येन इवामिषं यथा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
किरन्हि शरजालानि सर्वतो भैरवस्वरम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
किरातकिंनरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
किराततङ्गणाकीर्णं कुणिन्दशतसङ्कुलम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
किरातराजः सुमना यवनाधिपतिस्तथा |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
किरातराजो यान्प्रादाद्गृहीतः सव्यसाचिना |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महावलः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातरूपी भगवानर्दय़ामास फल्गुनम् ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
किरातरूपी भगवान्यया च; त्वय़ा महत्या परितोषितोऽभूत् |
२० क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातरूपी सहसा वारय़ामास शङ्करः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातवेषप्रच्छन्नं स्त्रीसहाय़ममित्रहा |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातवेषप्रच्छन्नः स्त्रीभिश्चानु सहस्रशः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
किरातश्च समं तस्मिन्नेकलक्ष्ये महाद्युतिः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रिय़जातय़ः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
किराता वर्वराः सिद्धा विदेहास्ताम्रलिङ्गकाः ||
५५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
किराता विकृता राजन्वहवोऽसिधनुर्धराः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
किरातानामधिपतिः सागरानूपवासिनाम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
किरातानामधिपतीन्व्यजय़त्सप्त पाण्डवः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
किरातैश्च समेष्यामि विषकल्पैः प्रहारिभिः |
४९ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
किरीटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेन माहुः किरीटिनम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
किरीटं सूर्यसङ्काशं यस्य मूर्धनि शोभते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेय़वाससम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभय़ङ्करम् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
किरीटमाली कौन्तेय़ः शूरः शान्तनवस्तथा ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
किरीटमाली कौन्तेय़ः सर्वान्प्राच्छादय़त्कुरून् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
किरीटमाली कौन्तेय़ो भोजानीकं न्यपातय़त् ||
१६ ख