शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
असमर्थस्य भृत्यस्य विसर्गः स्याददोषवान् |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
असमर्था विमोक्षाय़ भविष्यन्ति ममात्मजाः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
असमर्थाः परे जेतुमस्मान्युधि जनेश्वर ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
असमर्थो ह्यहं वाय़ोर्वलेन वलवान्हि सः ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
असमर्थोऽपसरणे सुकृशौ मातरौ च ते ||
२१ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
असमर्थ्य समारव्धो मूढत्वादविचिन्तितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
असमागम्य भीष्मेण संय़ुगे किं विकत्थसे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
असमाप्ते ततस्तस्य वचने वदतां वर |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
असमाप्ते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यसि ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
असमाप्तौ च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
असमीक्ष्य सदाचारैः सार्धं पापानुवन्धनैः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
असमीक्ष्यैव कर्माणि नीतिशास्त्रं यथाविधि ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
असमीक्ष्यैव दाशार्ह उपाय़ात्कुरुसद्म तत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
असमुच्छिद्य चैवेनान्निय़च्छेय़मुपाय़तः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
असमृद्धान्समृद्धार्थः पश्य पाण्डुसुतान्नृप ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
असमृद्धास्त्वपि सदा मोहय़न्त्यविचक्षणान् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
असम्प्रधार्य धर्माणां गतिं सूक्ष्मां दुरन्वय़ाम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
असम्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
असम्प्राप्तांस्तु तान्भीमः साय़कैर्नतपर्वभिः |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
असम्प्राप्तानसम्प्राप्तांश्चिच्छेदाशु महारथः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
असम्प्राप्तास्तु ता धारास्तेजसा जातवेदसः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
असम्प्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
असम्भवश्च धर्माणामीदृशानामराजसु |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
असम्भवादाददीत विशिष्टादपि धार्मिकात् ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
असम्भवे तु सर्वस्य यथामुख्येन निष्पतेत् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
असम्भवे त्वस्य हेतुः प्राय़श्चित्तं तु लक्ष्यते |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
असम्भवे प्रवेशस्य दाहय़ेदग्निना भृशम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
असम्भवे वा भैक्षस्य चरन्ननशनान्यपि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
असम्भवे श्रिय़ो राजन्हीनस्य सचिवादिभिः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
युधिष्ठिर उवाच
असम्भावितमित्रस्य भिन्नामात्यस्य सर्वशः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
असम्भावितरूपं हि त्वय़ि कर्म विगर्हितम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
भीम उवाच
असम्भावितरूपः सन्नानृशंस्यं करिष्यसि ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
असम्भावितरूपस्त्वं सुनृशंसं करिष्यसि ||
५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
असम्भावितवांश्चापि राजदारान्पुरं प्रति ||
८१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
अर्जुन उवाच
असम्भिन्नार्थमर्यादाः साधवः पुरुषोत्तमाः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
असम्भिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
असम्भोगी च मानी च तथा सङ्गी विकत्थनः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
असम्भोगो जरा स्त्रीणां वाक्षल्यं मनसो जरा ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमं दुराधर्षः शितैरस्त्रैरवारय़त् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमं भारत शत्रुघाती; जवेन वीरोऽनुससार नागम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमं भीमसेनो गदय़ा समताडय़त् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमं महाराज तावकानवधीद्वहून् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमं रणे भीष्मो विचकर्ष महद्धनुः |
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रमात्कार्मुकवाणपाणी; रथे स्थितः शान्तनवोऽभ्युवाच ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
असम्भ्रान्तं तु तद्रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रान्तः शरौघेण महता समवारय़त् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रान्ततरः कर्णः पर्त्युदीय़ाद्धनञ्जय़म् ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तो यत्नवान्यत्नवत्तरम् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रान्तश्च समरे सात्यकिः कुरुपुङ्गवम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
असम्भ्रान्तस्ततः कर्णस्तद्रक्षः प्रत्ययुध्यत ||
९८ ख