अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
असावाय़ाति भगवान्वृहस्पतिरुदारधीः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
असावाय़ाति शैनेय़स्तव पार्थ पदानुगः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
असिं च दीप्तं परमाय़ुधं च; शङ्खं च शुभ्रं स्वनवन्तमुग्रम् ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
असिं चिक्षेप समरे सौभद्रस्य महात्मनः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
असिं जग्राह सङ्क्रुद्धो जिघांसुर्भरतर्षभम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
असिं दृष्ट्वा द्विधा छिन्नं प्रगृह्य महतीं गदाम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
असिं प्रासृजदाविध्य त्वरन्कर्णरथं प्रति ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
असिं रुक्मत्सरुं शल्यः शैक्यं काञ्चनभूषणम् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
असिं समुद्धृत्य शितं सुधारं; कण्ठे समाक्रम्य च वेपमानम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
असिंहः सिंहसहितः सिंहवल्लभते फलम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
असिचर्मधरः श्रीमान्सौभद्रेण निपातितः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
असिचर्मप्लवा सिन्धुः केशशैवलशाद्वला |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
असिचर्माणि चापानि शिरांसि कवचानि च |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
असिचर्माददे वीरो धनुरुत्सृज्य भारत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
असितं चार्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
असितं सितकर्मस्थं कस्तं नार्चितुमर्हति ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
असिता च सुवाहुश्च सुप्रिय़ा सुवपुस्तथा |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
असिता च सुवाहुश्च सुव्रता सुभुजा तथा |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलः सत्यः सर्पमाली महाशिराः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
असितो देवलश्चैव तथा नारदपर्वतौ |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलश्चैव तस्मिन्नेव महातपाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
असितो देवलश्चैव देवय़ज्ञमुपागमन् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलश्चैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
असितो देवलश्चैव मार्कण्डेय़ोऽथ गालवः |
१०३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
असितो देवलश्चैव विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
असितो देवलस्तूर्णमुत्पपात पपात च ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलो राजंश्चिन्तय़ामास वुद्धिमान् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
अर्जुन उवाच
असितो देवलो व्यासः स्वय़ं चैव व्रवीषि मे ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
असितो ह्यपि देवर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मय़ा |
७३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
असिद्धानुनय़े कृष्णे कुरुभ्यः पाण्डवान्गते |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
असिद्धानुनय़े कृष्णे यदुवाच महामतिः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
असिद्धिः परमेतेभ्यो भूतेभ्यो मुक्तसंशय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशः कथं त्विह ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
असिना तीक्ष्णधारेण चिच्छेद वलिनां वरः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् ||
२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
असिना धनुषा शक्त्या हय़ैर्नागैर्नरै रथैः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
असिना धर्मगर्भेण पालय़स्व प्रजा इति ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
असिपत्रवनं घोरं वालुकां कूटशाल्मलीम् ||
८१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
असिपत्रवनं चैव निशितक्षुरसंवृतम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
असिप्रासाय़ुधधराः कृष्णस्यासन्पुरःसराः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
असिभिः पट्टिशैः प्रासैः शक्तिभिस्तोमरैरपि |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
असिभिः पट्टिशैः शूलैः शक्तितोमरमुद्गरैः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
असिभिः पट्टिशैः शूलैर्गदाभिश्च महावलाः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
असिभिः पट्टिशैः शूलैस्तक्षमाणाः पुनः पुनः |
७७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
असिभिश्छिद्यमानानां नडानामिव भारत ||
३७ ख