शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
न भिन्नवृत्ते न नृशंसवृत्ते; न चापि चौरे न गुरुष्वसूय़े ||
६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
न भीः सूर्य त्वय़ा कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न भीमं समरे मेने मानुषं भरतर्षभ ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न भीममुखसम्प्राप्तो मुच्येतेति मतिर्मम ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
न भीमसेनं न यमौ न पाञ्चाल्यं न सात्यकिम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न भीमसेनं सम्प्राप्य निवर्तेत कदाचन ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
न भीमसेने कोपं स नृपतिः कर्तुमर्हति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
न भीमसेने कोपो मे प्रीतोऽस्मि भरतर्षभ |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
न भीमसेनो न यमौ प्रतिकूलप्रभाषिणम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न भीरुरिति चात्यन्तं मन्त्रोऽदेय़ः कथञ्चन |
२०२ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
न भीर्भीमस्य न ग्लानिर्विक्षतस्यापि राक्षसैः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
न भीष्मं नैव च द्रोणं यथा त्वां मन्यते नृप ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
न भीष्मव्यसनं कश्चिद्दृष्ट्वा कर्णममन्यत |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
न भीष्मव्यसनं केचिन्नापि द्रोणस्य मारिष |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
न भुङ्क्ते यो नृपः सम्यङ्निष्फलं तस्य जीवितम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च पतन्ति ते ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न भुञ्जीत च मेधावी तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
न भुञ्जीतान्तराकाले नानृतावाह्वय़ेत्स्त्रिय़म् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
न भूः खं द्यौर्न भूतानि नर्षय़ो न सुरासुराः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
न भूतं न भविष्यन्तं सर्वराजसु भारत |
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
धृतराष्ट्र उवाच
न भूतपूर्वं वीभत्सोर्वाक्यं परुषमीदृशम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
न भूतानामहिंसाय़ा ज्याय़ान्धर्मोऽस्ति कश्चन ||
२९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
न भूतो न भविष्यश्च न च धर्मोऽस्ति कश्चन |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न भूमिदानादस्तीह परं किञ्चिद्युधिष्ठिर ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न भूमिदानाद्देवेन्द्र परं किञ्चिदिति प्रभो |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न भृत्यानां वृत्तिसंरोधनेन; वाह्यं जनं सञ्जिघृक्षेदपूर्वम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
न भेतव्यं च नहुषात्सत्यमेतद्व्रवीमि ते |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
न भेतव्यं त्वय़ा देवि नहुषाद्दुष्टचेतसः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भय़म् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
न भेतव्यं नरव्याघ्र को हि त्वा पुरुषर्षभ |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
न भेतव्यं महाराज न शोच्या भवता वय़म् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
न भेतव्यं सुपर्णोऽसि सुपर्ण त्यज सम्भ्रमम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
न भेरीशङ्खवादेषु प्रहर्तव्यं कथञ्चन ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
न भोक्ष्ये न च पानीय़मुपय़ोक्ष्ये कथञ्चन |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
न भ्राजते यथापूर्वं निषादानामिवालय़ः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
न भ्राजन्त यथापूर्वं भास्करेऽस्तं गतेऽपि च ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
न भ्राजिष्ये महाप्राज्ञ क्षीणरश्मिरिवांशुमान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं न च वान्धवाः ||
११२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
न भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्रीय़ं न च मातुलः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
स्त्र्यु उवाच
न भ्रातॄन्न च भर्तारं न पुत्रान्न च देवरान् ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
न भय़ं क्रोधचापल्यं न शोकस्तेषु विद्यते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
न भय़ं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति |
१२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
न भय़ं चक्रिरे पार्थाद्भीमसेनादनन्तरात् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
मुनिरु उवाच
न भय़ं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथञ्चन |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
न भय़ं न च सन्तापो न चेर्ष्या न च मत्सरः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न भय़ं विद्यते जातु नरस्येह दय़ावतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न भय़ं विद्यते राजन्भीतस्यानागते भय़े |
२०१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
न भय़ाद्वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाद्युते |
२२ क