chevron_left  असुरेन्द्रमुपामन्त्र्यarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
असुरेन्द्रमुपामन्त्र्य जगाम स्वं निवेशनम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
असुरेन्द्रसुता सुभ्रु परं कौतूहलं हि मे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
असुरेष्ववसं पूर्वं सत्यधर्मनिवन्धना |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
कच उवाच
असुरैः सुराय़ां भवतोऽस्मि दत्तो; हत्वा दग्ध्वा चूर्णय़ित्वा च काव्य |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
असुरैरिषुभिर्विद्धौ चन्द्रादित्याविमावुभौ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलाय़ुधैः |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृताः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
असुरैर्वध्यमानं तत्पावकैरिव काननम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
असुरैर्वध्यमानास्ते क्षीणप्राणा दिवौकसः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
देवय़ान्यु उवाच
असुरैर्हन्यमाने च कच त्वय़ि पुनः पुनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
असुर्या नाम ते लोका गां दत्त्वा तत्र गच्छति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
असुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जय़ेत्प्रजाः ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ||
१६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
असूनिव विचिन्वन्तो देहे तस्य महात्मनः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वाय़ुना |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वाय़ुना |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २१८
ऋषय़ ऊचुः
असूर्ये च भवेत्सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमाः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
असूय़को दन्दशूको निष्ठुरो वैरकृन्नरः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
असूय़को नरश्चापि मृतो जाय़ति शार्ङ्गकः |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
असूय़त महाभागा सान्तरिक्षेऽश्विनावुभौ ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
असूय़तश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
असूय़ता च यद्दत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
असूय़न्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
असूय़वस्त्वधर्मिष्ठाः परस्वादाय़िनः शठाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
असूय़ा चानसूय़ा च धर्माधर्मौ तथैव च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
असूय़ा जाय़ते तीव्रा कारुण्याद्विनिवर्तते ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
असूय़ां पाण्डुपुत्रेषु न भवान्कर्तुमर्हति ||
४८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
अर्जुन उवाच
असूय़ितारं वक्तारं प्रस्रष्टारं दुरात्मनाम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
असूय़ैकपदं मृत्युरतिवादः श्रिय़ो वधः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
असृजं जामदग्न्याय़ रामाय़ाहं जिघांसय़ा ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
असृजच्छरवर्षाणि वर्षाणीव पुरन्दरः ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
असृजत्पह्लवान्पुच्छाच्छकृतः शवराञ्शकान् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
असृजत्स तदा लोकान्कृत्स्नान्स्थावरजङ्गमान् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
असृजत्स ह यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापतिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
असृजत्सर्वभूतानि पूर्वसृष्टः प्रजापतिः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
असृजद्दण्डनीतिः सा त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
असृजद्धि प्रजा राजन्प्रजापतिरकल्मषः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
असृजद्विशिखांस्तीक्ष्णान्केकय़स्य रथं प्रति ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
असृजद्वृत्तिमेवाग्रे प्रजानां हितकाम्यया ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
असृजद्व्राह्मणानेव पूर्वं व्रह्मा प्रजापतिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
असृजन्सुमहद्भूतमय़ं धर्मो भविष्यति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
असृजल्लक्ष्मणाय़ाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
असृजेतां तु षट्पुत्राञ्शृणु तासां प्रजाविधिम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असेरष्टौ च नामानि रहस्यानि निवोध मे |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असेरुत्पत्तिसंसर्गो यथावद्भरतर्षभ ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असेरेतानि रूपाणि दुर्वाचादीनि निर्दिशेत् |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असेरेव प्रमाणानि परिमाणव्यतिक्रमात् ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् ||
६६ ख