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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
अजेय़ः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अजेय़ः स्यामिति विभो सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
अजेय़मजितं युद्धे तं न पश्यामि फल्गुनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
अजेय़मुग्रधन्वानं तं न पश्यामि फल्गुनम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
अजेय़मुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
उमा उवाच
अजेय़श्चाप्रधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिय़ा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अजेय़स्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ||
७५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
अजेय़ा जय़तां श्रेष्ठ पार्थाः प्रव्राजिता वनम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अजेय़ाः पाण्डवा युद्धे देवैरपि सवासवैः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
अजेय़ाः पाण्डवाः सङ्ख्ये सौम्य संशाम्य पाण्डवैः |
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
अजेय़ाः पुरुषैरन्यैरिति तांश्चोत्सहामहे ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अजेय़ाश्चेति मे वुद्धिरपि देवैः सवासवैः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अजेय़ो मानुषे लोके पाण्डवैरभिरक्षितः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
अजेय़ो युधि भीष्मोऽय़मपि देवैरुदारधीः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अजेय़ो ह्यर्जुनः क्रुद्धः सर्वैरपि सुरासुरैः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
अजेय़ो ह्यर्जुनः सङ्ख्ये पृष्ठगोपे वृकोदरे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अजेय़ौ मानुषे लोके सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अजेय़ौ वासवेनापि समरे वीरसंमतौ ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
अजेय़ौ समरे यत्तौ सहितावमरैरपि |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
अजेय़ौ समरे वृद्धौ विराटद्रुपदावुभौ |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः ||
१०० ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
अजैकपादहिर्वुध्न्यः पिनाकी च परन्तपः ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अजैकपादहिर्वुध्न्यः पिनाकी च परन्तपः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अजैकपादहिर्वुध्न्यै रक्ष्यते धनदेन च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
अजैकपादहिर्वुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
अजैषीर्महतो लोकान्महाय़ज्ञैरिवाभिभो |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
जनक उवाच
अजैषीर्यद्वन्दिनं त्वं विवादे; निसृष्ट एष तव कामोऽद्य वन्दी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अजो जनय़ते व्रह्मा देवर्षिपितृमानवान् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
अजो नामाभवद्राजा महानिक्ष्वाकुवंशजः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अजो नित्यः शाश्वतोऽय़ं पुराणो; न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
अजो भोजश्च विक्रान्तौ पाण्डवेषु महारथौ |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
अजो हि शस्त्रमखनत्किलैकः; शस्त्रे विपन्ने पद्भिरपास्य भूमिम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अजोदरो गजशिराः स्कन्धाक्षः शतलोचनः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
अजोऽश्वः क्षत्रमित्येतत्सदृशं व्रह्मणा कृतम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अजौ नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चय़ाः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशय़ात्मा विनश्यति |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
अज्ञातं कार्तवीर्यस्य हैहय़ेन्द्रस्य धीमतः ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातं च विराटस्य विजित्य वसु धर्मराट् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातं धृतराष्ट्रस्य यत्नेन महता ततः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किञ्चन ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अज्ञातचर्या पाण्डूनां वासो व्राह्मणवेश्मनि |
८५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातचर्या वालानामवरोधश्च केशव ||
५७ ग