chevron_left  अस्तिarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अस्ति सोमान्ववाय़े मे जातः कश्चिन्नृपः सखा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति स्विद्दस्युमर्यादा यामन्यो नातिलङ्घय़ेत् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति स्विद्दस्युमर्यादा यामहं परिवर्जय़े ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽवले |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
जनक उवाच
अस्तित्वं केवलत्वं च विनाभावं तथैव च |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात्पिता गर्भस्थमेव तम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
अस्तीत्युदरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
अस्तु मे सङ्गमो देव यथोक्तं भगवंस्त्वय़ा |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
अस्तु राजा महाराज यं चान्यं मन्यते भवान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
अस्तु वात्र फलं मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
अस्तु शेषं कुलस्यास्य मा पराभूदिदं कुलम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्तु शेषं कौरवाणां मा पराभूदिदं कुलम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्तुवंस्ते नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
अस्तुवन्निय़तात्मानः कर्मभिः शुभकर्मिणम् ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्तुवन्मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षय़ः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
अस्तुवन्मुनय़ो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामय़े ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अस्तुवन्विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं सुरास्तदा ||
१४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्तुवन्विश्वकर्माणं वासुदेवं प्रजापतिम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अस्तेनं स्तेन इत्युक्त्वा द्विगुणं पापमाप्नुय़ात् ||
३९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अस्तेनश्चातिथिज्ञश्च स राजन्केतनक्षमः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
अस्तो नाम यतः सन्ध्या पश्चिमा प्रतिसर्पति ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
शुक्र उवाच
अस्तोतुः स्तूय़मानस्य दुहिता देवय़ान्यसि ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
सावित्र्यु उवाच
अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
अस्तौषं त्वां तव संमानमिच्छ; न्विचिन्वन्वै सवृषं देववर्य |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
जनमेजय़ उवाच
अस्तौषीद्यैरिमं व्यासः सशिष्यो मधुसूदनम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्यन्यो भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
विशोक उवाच
अस्त्याय़ुधं पाण्डवेय़ावशिष्टं; न यद्वहेच्छकटं षड्गवीय़म् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्युत्तरेण कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति |
४० क
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
अस्त्युपाय़ो मय़ा दृष्टो निरपाय़ो नरेश्वर |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
अस्त्येव त्वय़ि शोको वै हर्षश्चास्ति तथा त्वय़ि |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
अस्त्येष गर्भः सुभगे तव वैश्वानरोपमः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत्प्रतिष्ठितम् |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
अस्त्रं चतुर्विधं वेद यथैव त्रिदशेश्वरः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्च व्यतिक्रमः ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं दिव्यं महेष्वासो वारुणं समुदैरय़त् ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अस्त्रं द्रोणादर्जुनाद्वासुदेवा; त्कृपाद्भीष्माद्येन कृतं शृणोमि |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अस्त्रं प्रादुश्चकारोग्रं नाराय़णममर्षितः ||
१६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं मामेव हन्याद्धि पश्य त्वद्य वलं मम ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं यस्मै गुह्यमुवाच धीमा; न्द्रोणस्तदा तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रं वलं चात्मनि मन्यमानाः; सर्वे समुत्पेतुरहङ्कृतेन ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
व्यास उवाच
अस्त्रं व्रह्मशिरस्तात विद्वान्पार्थो धनञ्जय़ः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रं व्रह्मशिरो नाम दहेद्यत्पृथिवीमपि ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रं व्रह्मशिरो नाम देवगन्धर्वपूजितम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रं व्रह्मशिरो नाम सप्रय़ोगनिवर्तनम् ||
७४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
व्यास उवाच
अस्त्रं व्रह्मशिरो यत्र परमास्त्रेण वध्यते |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं व्राह्मं मनसा तद्ध्यजय़्यं; क्षेप्स्ये पार्थाय़ाप्रतिमं जय़ाय़ |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं हि रामात्कर्णेन भार्गवादृषिसत्तमात् |
१०१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रग्रामं ससंहारं द्रोणात्प्राप्य सुदुर्लभम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
अस्त्रग्रामश्च माहेन्द्रो रौद्रः कौवेर एव च ||
३२ ख