आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
अस्त्रज्ञेषु प्रय़ुक्तैषा फेनवत्प्रविलीय़ते ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशस्त्रविशारदौ |
८८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रतेजः शमय़ितुं लोकानां हितकाम्यया ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
दुर्योधन उवाच
अस्त्रप्रतापेन जितौ श्रुताय़ुश्च निवर्हितः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
अस्त्रमप्रतिसन्धेय़ं तदद्भुतमिवाभवत् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
अस्त्रमस्त्रेण तु रणे तव संशमय़िष्यता |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद्विसृजञ्शरान् ||
५२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
अस्त्रमस्त्रेण सर्वेषामेतेषां मधुसूदन |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रमाग्नेय़मग्नेश्च वाय़व्यं मातरिश्वनः |
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रमादित्यसङ्काशं गाण्डीवे समय़ोजय़त् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
अस्त्रवर्षेण महता काल्यमानं वलं ततः |
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रवर्षेण महता जनौघैश्चापि संवृतौ ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रवान्वीर्यसम्पन्नः क्रोधेन च समन्वितः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
अस्त्रवाहुवलं नित्यं क्षत्रिय़ेषु प्रतिष्ठितम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिर्दृढधन्विभिः |
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
अस्त्रविद्भिरनाधृष्यो दूरपाती दृढाय़ुधः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
अस्त्रवीर्यं रणे यच्च भुजय़ोश्च महाभुज ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिनम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
अस्त्रवेगप्रतिहता सा गदा प्रापतद्भुवि |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
अस्त्रवेगानिलोद्धूतः सेनाकक्षेन्धनोत्थितः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रवेगेन महता पार्थो वाहुवलेन च |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रव्युपरमाद्धृष्टं तव पुत्रजिघांसय़ा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रशस्त्रप्रदीप्तेऽग्नौ यदा तं पातय़िष्यति |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रसम्वाधनिर्मुक्तौ विमुक्तौ शस्त्रसङ्कटात् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रस्यास्य प्रभावाद्वै व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तं तपसा कौरवर्षभम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान्ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा निय़तः संय़तेन्द्रिय़ः ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रहेतोरिह प्राप्तः कस्माच्चित्कारणान्तरात् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रहेतोर्गतं ज्ञात्वा पाण्डवं श्वेतवाहनम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
४९
जनमेजय़ उवाच
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि |
१ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रहेतोर्महावाहुरमितात्मा विवासितः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रहेतोर्महेन्द्रं च रुद्रं चैवाभिगच्छतु |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ||
१०६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
अस्त्राग्निना निर्दहेय़ं पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
अस्त्राग्निना विचित्रोऽय़ं दग्धो मे रथ उत्तमः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वाय़ोस्तथाश्मनाम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अस्त्राणां च धनुर्वेदे व्राह्मे वेदे च पारगम् |
३२ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्राणां च प्रणाशेन वाहुवीर्यस्य सङ्क्षय़ात् |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
अस्त्राणां च प्रभावं मे धनुषो गाण्डिवस्य च ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्राणां च वलं तेषां मानुषेषु प्रय़ुज्यताम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्राणां च वलं सर्वं वाह्वोश्च वलमाहवे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अस्त्राणां प्रतिघाते च सर्वथैव प्रय़ोजय़ेः ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अस्त्राणां सङ्गमश्चैव घोरस्तत्राभवन्महान् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
राम उवाच
अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
अस्त्राणि च विचित्राणि क्रुद्धास्तत्र व्यदर्शय़न् |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्राणि च विचित्राणि नीतिशास्त्रं च केवलम् ||
२४ ख