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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते |
४८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माकं भवतां चैव येय़ं प्रीतिर्हि शाश्वती |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
अस्माकं भय़भीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
अस्माकं भय़भीतानां नित्यशो भगवान्गतिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माकं रोचते चैव श्रेय़श्च तव भारत |
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
अस्माकं व्रह्महत्यातो कोऽन्तो लोकपितामह |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं शकटव्यूहो द्रोणेन विहितोऽभवत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अस्माकं शमकामा वै त्वं च पुत्रो ममेत्यथ ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
पितर ऊचुः
अस्माकं सन्ततिस्त्वेको जरत्कारुरिति श्रुतः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं सहजं मित्रं पाण्डवाः शुद्धपौरुषाः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं हि वनस्थानां हैडिम्वेन महात्मना |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १७४
अर्जुन उवाच
अस्माकमनुरूपो वै यः स्याद्गन्धर्व वेदवित् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माकमपि ते जन्म विदितं कमलेक्षणे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
अस्माकमपि वार्ष्णेय़ वने विचरतां तदा |
८ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि |
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माच्च कृष्णात्सङ्क्रुद्धात्पावकाच्च दिधक्षतः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माञ्जेतुमिहाय़ातो मत्स्यो वापि स्वय़ं भवेत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अस्मात्ते संशय़ान्मुक्तः समित्रगणवान्धवः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
अस्मात्परस्त्वेष महाधनुष्मा; न्पुत्रः कुणिन्दाधिपतेर्वरिष्ठः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अस्मात्परो न भविता धनुर्धरो; न वै भूतः कश्चन जातु जेता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
अस्मात्प्रवक्ष्यते धर्मान्मनुः स्वाय़म्भुवः स्वय़म् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
अस्मादेकस्माद्वहवो रक्षितव्या; नैको वहुभ्यो गौतमि रक्षितव्यः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
अस्माद्धि कुरुमुख्यानां महदुत्पत्स्यते भय़म् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माद्युद्धात्समुत्तीर्णानपि वः ससुहृज्जनान् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माद्विमुक्तं सङ्ग्रामात्पश्येय़ं पाण्डवैः सह |
६० ख
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
अस्माद्विलान्निष्पतितं श्येन आखुं जहार तम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानध्यापय़स्वेति तानुवाच ततो मुनिः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
अस्माननिष्ट्वा क्रतुभिर्भागो नो न भविष्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
अस्मानन्तकरान्घोरान्पाण्डवान्वृष्णिसंहितान् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानपि च दुष्टात्मा नित्यकालं प्रवाधते ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
अस्मानपि जघानाशु पीडय़न्निशितैः शरैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
अस्मानप्यनय़स्तस्मात्प्राप्तोऽय़ं दारुणो महान् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
भीष्म उवाच
अस्मानभिगतश्चासि वय़ं च त्वामुपस्थिताः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
अस्मानभिगतांस्तात भय़ार्ताञ्शरणैषिणः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
अस्मानभिगतैः कामात्सवलैः सपदानुगैः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
अस्मानभिसृतैः कामात्सवलैः सपदानुगैः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अस्मानभ्यागमन्पार्था वृकोदरपुरोगमाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानमी धार्तराष्ट्राः क्षममाणानलं सतः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अस्मानापततश्चापि दृष्ट्वा पार्था महारथाः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अस्मानासाद्य सञ्जातं गोष्पदोपममच्युत ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषां चेमां यशस्विनीम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
अस्मानुपगता वीर निहताश्चापि शत्रवः ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
अस्मानृते नास्ति तवोपलव्धि; स्त्वामप्यृतेऽस्मान्न भजेत हर्षः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान्मुदितमानसाः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अस्मानेवोपजीवंस्त्वमस्माकं विप्रिय़े रतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
अस्मान्न कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाप्यपूजय़त् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अस्मान्न त्वं सदा भक्तानिच्छस्यमितविक्रम |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
ऋषय़ ऊचुः
अस्मान्नूनमय़ं शास्ति वय़ं च विघसाशिनः ||
६ ख