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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
सर्वगन्धान्रसांश्चैव धारय़ेत समाहितः |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वगश्चैव कौरव्य सर्वं व्याप्य चराचरम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
सर्वगात्रप्रताय़िन्यस्तस्या ह्यनुगताः सिराः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सर्वगात्रेषु सङ्क्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडय़त् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सर्वगुह्यगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय़ |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वगुह्यतमं भूय़ः शृणु मे परमं वचः |
६४ क
वन पर्व
अध्याय १७८
युधिष्ठिर उवाच
सर्वज्ञं त्वां कथं मोह आविशत्स्वर्गवासिनम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सर्वज्ञः सर्वतो दृष्ट्वा कीटं वचनमव्रवीत् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
सर्वज्ञः सर्वतो मुक्तो मुच्यते नात्र संशय़ः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च क्षेत्रज्ञस्तानि पश्यति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वत्र च कुतूहली ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभय़ङ्करः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वज्ञतां च लभते गतिमग्र्यां च विन्दति ||
६९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
सर्वज्ञा यवना राजञ्शूराश्चैव विशेषतः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
सर्वज्ञा सर्वधर्मज्ञा तिर्यग्योनिगतापि सा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
सर्वज्ञां सर्वधर्मज्ञां देवलोके मनस्विनीम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्मामाहुर्द्विजसत्तमाः ||
४३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||
३२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सता |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
सर्वज्ञोऽस्मीति वचनं व्रुवाणः संशितव्रतः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः क्रोधमाविश्य चिक्षेप परवीरहा ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
सर्वतः परिगृह्णीय़ाद्राज्यं प्राप्येह धार्मिकः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
सर्वतः परिरक्षेच्च यो महीं भोक्तुमिच्छति ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तदा |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
अर्जुन उवाच
सर्वतः परिवार्यैनं दावेन महता प्रभो |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
सर्वतः पापदर्शी च नास्तिको वेदनिन्दकः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
सर्वतः प्रतिगृह्णीय़ाद्राज्यं प्राप्येह धार्मिकः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः प्रतिविद्धस्तु तव पुत्रैर्महारथैः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः प्रत्यगृह्णन्त तदभूल्लोमहर्षणम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
सर्वतः प्रार्थ्यमानेन दुर्वलेन महावलैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वतः प्लावय़न्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
सर्वतः शङ्कते स्तेनो मृगो ग्राममिवेय़िवान् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः शुशुभे राजन्रणेऽरीणां दुरासदः ||
२० ग
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतः संवृतानुच्चैः प्राकारैः सुकृतैः सितैः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतः संवृतैर्नद्धः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रितैः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः संवृतो योधै राजन्पुरुषसत्तमैः ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतः संवृतो वीरैः समरेष्वनिवर्तिभिः ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
सर्वतः सत्कृतः सद्भिर्भूतिप्रभवकारणैः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतः समरे पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
सर्वतः सलिलं शीतं जीमूत इव वर्षति ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पय़ोदा नभस्तलम् |
७५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
सर्वतः सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सर्वतः सुखमन्वेति वपुश्चान्द्रमसं यथा ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
सर्वतःपाणिपादं तं सर्वतोक्षिशिरोमुखम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
सर्वतःपाणिपादश्च सर्वतोक्षिशिरोमुखः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोक्षिशिरोमुखः |
४१ क