आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
कीचकेन पदा स्पृष्टा का नु जीवेत मादृशी ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
कीचको मावधीत्तत्र सुराहारीं गतां तव |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
कीचको राजवाल्लभ्याच्छोककृन्मम भारत ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
कीचको रोषसन्तप्तः पदान्न चलितः पदम् ||
५४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
कीचको वलवान्भीमं जानुभ्यामाक्षिपद्भुवि ||
५० ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
कीचकोऽय़ं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थय़ते हि माम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
कीचकोऽय़ं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
कीट सन्त्रस्तरूपोऽसि त्वरितश्चैव लक्ष्यसे |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
कीटः सञ्जाय़ते जन्तुस्ततो जाय़ति मानुषः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
कीटकावसनश्चैव चीरवासास्तथैव च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा; न मे विवक्षास्ति महानुभाव ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
कीदृग्वर्णोऽपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते |
६७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कीदृशं च भवेद्राज्यं मम हीनस्य वन्धुभिः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
कीदृशं चाभवद्युद्धं तस्य घोरस्य रक्षसः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
कीदृशं वर्म चैवास्य कण्ठत्राणं च कीदृशम् |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
इन्द्र उवाच
कीदृशं वै वलं देवि पत्युस्तव भविष्यति |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशं व्यवहारं तु कैश्च व्यवहरेन्नृपः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशः कृतकः पुत्रः सङ्ग्रहादेव लक्ष्यते |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
कीदृशा भगवँल्लोका गवां तद्व्रूहि मेऽनघ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशा मानवाः सौम्याः कैः प्रीतिः परमा भवेत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
कीदृशाः किम्फलाः कः स्वित्परमस्तत्र वै गुणः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशाः साधवो विप्राः केभ्यो दत्तं महाफलम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशानां च भोक्तव्यं तन्मे व्रूहि पितामह ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशाय़ प्रदातव्या न देय़ाः कीदृशाय़ च ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
कीदृशाय़ प्रदेय़ा स्यात्कन्येति वसुधाधिप ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
कीदृशी दक्षिणा चैव गोप्रदाने विशिष्यते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
जनमेजय़ उवाच
कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु वा भरतर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशे विश्वसेद्राजा कीदृशे नापि विश्वसेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
कीदृशेनेह तपसा गच्छेय़ं परमां गतिम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशेभ्यः प्रदातव्यं भवेच्छ्राद्धं पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशैः किङ्कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीय़ते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशो जापको याति निरय़ं वर्णय़स्व मे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
कीदृश्यां कीदृशाश्चापि पुत्राः कस्य च के च ते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
कीदृषाः संनिकर्षस्था भृत्याः स्युर्वा गुणान्विताः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
कीर्तनं श्रवणं दानं दर्शनं चापि पार्थिव |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ||
९५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
कीर्तिं च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान्प्राप्स्यसे च जनाधिप ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोवलात् |
२१ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिं प्रच्छाद्य तेषां वै कुरुराजोऽधितिष्ठति ||
२६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
कीर्तिं प्रथय़ता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिं प्रथय़ता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नय़त माचिरम् ||
११ ख