विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अविश्रमं च शिक्षां च लाघवं दूरपातिताम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
अविश्रम्भेषु वर्तन्ते विश्रम्भेष्वप्यसंशय़म् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अविश्रान्तमनालम्वमपाथेय़मदैशिकम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यभीतेषु पार्थिव |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
अविश्वासः स्वय़ं चैव परस्याश्वासनं तथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
अविश्वासकथामेतामुपश्रुत्य पितामह ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
अविश्वासश्च सर्वत्र मृत्युना न विशिष्यते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
अविश्वासो नरेन्द्राणां गुह्यं परममुच्यते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अविश्वास्ये विश्वसिषि मन्यसे चाध्रुवं ध्रुवम् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अविषण्णं महात्मानं त्वरमाणः समभ्ययात् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रे समवासृजत् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यं च मन्वानः कर्णं दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यं तु पार्थस्य शरसम्पातमाहवे |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
अविषह्यं पृथिव्यापि तद्वलं यत्र केशवः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यः समुद्रो हि वहुसत्त्वगणालय़ः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अविषह्यतमं मन्ये मा स्म दुर्वलमासदः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यतमा ह्येते निश्चिताः पार्थ षड्रथाः |
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
अविषह्यतमान्मन्ये महेन्द्रेणापि मातुल ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
अविषह्यमनाधृष्यं शतक्रतुवलोपमम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
अविषह्यमनावार्यं तीव्रवेगपराक्रमम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अविषह्यवलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अविषह्यां महावाहुः सुरैरपि महामृधे ||
८२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अविषह्येन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रय़ः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
अविषादश्च धैर्यं च पार्थान्नान्यत्र विद्यते ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
कर्ण उवाच
अविषादस्य चैवास्य शस्त्रास्त्रविनय़स्य च ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अविसंवादको दक्षः कृतज्ञो मतिमानृजुः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अविसंवादनं दानं समय़स्याव्यतिक्रमः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारय़ेन्मनः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अविहाय़ महाराज विहंसि समरे रिपून् ||
५४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अविय़ातो विय़ातस्य मौर्ख्याद्धूर्तस्य पश्यतः |
१४ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अवीरजोऽभिघातस्ते व्राह्मणो वा हतस्त्वय़ा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अवीराचरितां राजन्न वलस्थैर्निषेविताम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अवीर्यो वेदनाद्विद्यात्सुवीर्यो वीर्यवत्तरम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अवीवृषन्वाणमहौघवृष्ट्या; यथा गिरिं तोय़धरा जलौघैः ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
अवुद्धसेवनाच्चापि वुद्धोऽप्यवुधतां व्रजेत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
अवुद्धापतितेनाथ नादेन विपुलेन सा |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
अवुद्धिजं तमस्त्यक्त्वा लोकांस्त्यागवतां गताः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
अवुद्धिपूर्वं कृत्वापि श्रेय़ आत्मवधो मम ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
अवुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अवुद्धिपूर्वं भगवन्धेनुरेषा हता तव |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
युधिष्ठिर उवाच
अवुद्धिपूर्वं यः पापं कुर्याद्भरतसत्तम |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
अवुद्धिपूर्वं व्रह्महत्या तमागच्छन्महीपतिम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
अवुद्धिमाश्रितानां च क्षन्तव्यमपराधिनाम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अवुद्धिमोहजैर्गुणैः शतैक एव युज्यते ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अवुद्धिमोहनं पुनः प्रभुर्विना न यावकम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
अवुद्धिरज्ञानकृता अवुद्ध्या दुष्यते मनः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अवुद्धिरेषा महती धर्मराजस्य पाण्डव |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
अवुद्धिरेषा युष्माकं व्रह्महत्या न शोभना ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अवुद्ध्वा यन्न गृह्णीथास्तन्मे सुमहदप्रिय़म् |
१० क