अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
अस्य नाभ्यां पुष्करं सम्प्रसूतं; यत्रोत्पन्नः स्वय़मेवामितौजाः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य पापस्य दुर्जातेर्भारतापसदस्य च |
४६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं निय़तोऽस्मि सुदुर्मतिः ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
अस्य पुत्रं हृषीकेश सुवक्त्रं चारुकुण्डलम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अस्य पुत्रैर्हि मे व्रह्मन्कृत्स्नो वंशः प्रणाशितः |
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अस्य प्रतिप्रिय़ं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
अस्य प्रवर्तनाच्चैव प्रजावन्तो भविष्यथ |
४७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
अस्य भार्यामिषप्रेप्सून्गृध्रानेतांस्तपस्विनी |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य भावमविज्ञाय़ सङ्क्रुद्धा मोघगर्जिताः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अस्य मे जननी हेतुः पावकस्य यथारणिः |
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
अस्य यज्ञस्य वेत्ता त्वं भविष्यसि जनार्दन |
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य राज्ञो हतान्पुत्राञ्शोचतो न शमो विभो ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
अस्य लोकप्रदीपस्य सवितुः क्षत्रिय़र्षभ ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महावलः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्य लोकस्य सर्वस्य यः पतिः परिपठ्यते |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य वर्षस्य शेषं चेद्व्यतीय़ुरिह पाण्डवाः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अस्य वाक्यस्य निधने कुरुराजस्य भारत |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य वालस्य भगवन्नाधिपत्यं यथेप्सितम् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य विष्णोः पुरा राजन्प्रभावोऽय़ं मय़ा श्रुतः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
अस्य वीर्यवतो वीर्यं नानुय़ास्यन्ति पार्थिवाः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य शङ्खप्रणादेन कर्णौ मे वधिरीकृतौ ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४१
उत्तर उवाच
अस्य शङ्खस्य शव्देन धनुषो निस्वनेन च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मय़ा नित्यमतन्द्रिणा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्य शोकं महावाहो प्रणाशय़ितुमर्हसि ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अस्य संरक्षणे सर्वे यतध्वं विगतज्वराः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अस्यतः कङ्कपत्राणां सहस्राणि शतानि च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अस्यतः कर्णिनालीकान्मार्गणान्हृदय़च्छिदः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्यतः प्रतिसन्धाय़ विवृतं सव्यसाचिनः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अस्यतः सूतपुत्रस्य मित्रार्थे चित्रय़ोधिनः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
अस्यता येन सङ्ग्रामे धरण्यभिनिपीडिता |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
अस्यतां फल्गुनः श्रेष्ठो गाण्डीवं धनुषां वरम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अस्यतां यतमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अस्यतामर्जुनः श्रेष्ठो गाण्डीवं धनुषां वरम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अस्यतो लघुहस्तस्य दिशः सर्वा महेषुभिः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अस्यतो लघुहस्तस्य पृषत्कैर्धनुराच्छिनत् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्यन्तं दिव्यमस्त्रं मां चित्रमद्य निशामय़ |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अस्यन्तमिषुजालानि यान्तं द्रोणादवारय़त् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
अस्यन्नेको वनचरो वभौ राम इवापरः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
अस्यन्नेकोऽनय़त्सर्वाः पितृलोकं धनञ्जय़ः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
व्रह्मो उवाच
अस्या देव्याः पतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अस्या नु नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् |
३० क