chevron_left  अज्ञातचर्यांarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अज्ञातचर्यां पश्यामि मेरोरिव निगूहनम् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातचर्यां वत्स्यन्तो राष्ट्रे वर्षं त्रय़ोदशम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातचर्यां विधिवत्समाप्य; भवद्गताः केशव पाण्डवेय़ाः ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातचर्यां व्यचरन्समाहिताः; समुद्रनेमीपतय़ोऽतिदुःखिताः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं मे किं करिष्यति |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातमेकं राष्ट्रे च तथा वर्षं त्रय़ोदशम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
अज्ञातलिप्सां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवासं वत्स्यन्तश्छन्ना वर्षं त्रय़ोदशम् |
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
अज्ञातवासं वसतो मद्गृहे निषधाधिप ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवासं वीभत्सुरथास्माभिः समागतः ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवासगमनं द्रौपदीशोकवर्धनम् |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवासचर्या च नानावेशसमावृतैः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
अज्ञातवासमवसद्राज्ञस्तस्य निवेशने ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
अर्जुन उवाच
अज्ञातवासमुषिता गर्भवास इव प्रजाः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभय़ार्दिताः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
अज्ञातवासश्च कृतः शत्रूणां वधकाङ्क्षय़ा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातवाससमय़ं शेषं वर्षं त्रय़ोदशम् |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञाता धार्तराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यवः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय १
अर्जुन उवाच
अज्ञाता विचरिष्यामो नराणां भरतर्षभ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
अज्ञातानां च विज्ञानात्सम्वोधाद्वुद्धिरुच्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अज्ञातिता नातिसुखा नावज्ञेय़ास्त्वतः परम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अज्ञातिमन्तं पुरुषं परे परिभवन्त्युत ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातैर्यदि वा ज्ञातैः कर्तव्यं नृपतेः प्रिय़म् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
अज्ञानं चातिलोभश्चाप्येकं जानीहि पार्थिव ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
अज्ञानकर्म निर्दिष्टमेतत्कारणलक्षणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
अज्ञानज्ञानय़ो राजन्विहितान्यनुजानते ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अज्ञानतः कर्मय़ोनिं भजन्ते; तां तां राजंस्ते यथा यान्त्यभावम् |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
अज्ञानतस्तत्र पतन्ति मूढा; ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
अज्ञानतृप्तो विषय़ेष्ववगाढो न दृश्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
अज्ञानप्रभवं नित्यमहङ्कारं परित्यजेत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच
अज्ञानप्रभवं हीदं यद्दुःखमुपलभ्यते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच
अज्ञानमपि वै तात श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
अज्ञानमेतन्निर्दिष्टं पापानां चैव याः क्रिय़ाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
भीष्म उवाच
अज्ञानसागरो घोरो ह्यव्यक्तोऽगाध उच्यते |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच
अज्ञानस्य प्रवृत्तिं च स्थानं वृद्धिं क्षय़ोदय़ौ |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिय़ा वा पुरुषेण वा |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद्वचनं साधु मन्यते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
अज्ञानात्क्लेशमाप्नोति तथापत्सु निमज्जति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
अज्ञानात्तु कृतां हिंसामहिंसा व्यपकर्षति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
भीष्म उवाच
अज्ञानात्परिपृच्छामि त्वं हि ज्ञानमय़ो निधिः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
अज्ञानात्सम्प्रवृत्तस्य भगवन्क्षन्तुमर्हसि ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
अज्ञानात्स्खलिते दोषे प्राय़श्चित्तं विधीय़ते ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
अज्ञानादभ्यवस्कन्द्य प्राप्ताः स्मो भय़मुत्तमम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
निषादा ऊचुः
अज्ञानाद्यत्कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु |
२३ क