आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
किंनरैरप्सरोभिश्च देवैरपि च सेवितम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
किंनरैरप्सरोभिश्च निषेवितशिलातलम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
किंनरैर्देवगन्धर्वैर्यक्षभूतगणैस्तथा ||
६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
किंनरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
किंनामधेय़गोत्रो वः पुत्रका व्राह्मणः पिता |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
किंनामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
किंनाम्नी भगिनीय़ं ते व्रूहि सत्यं भुजङ्गम ||
३३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किंनिमित्तं च पतनं व्रूहि मे यदि वेत्थ ह ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
आस्तीक उवाच
किंनिमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
किंनिमित्तमभूद्वैरं विश्वामित्रवसिष्ठय़ोः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
युधिष्ठिर उवाच
किंलक्षणं च तत्प्रोक्तं व्रूहि मे वदतां वर ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
किंवर्णं कीदृशं चैव निवेशय़ति वै मनः |
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
किंविशिष्टाः कस्य धामोपय़ान्ति; तद्वै व्रूहि क्षेत्रवित्त्वं मतो मे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
युधिष्ठिर उवाच
किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किम्पराय़णः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
युधिष्ठिर उवाच
किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किम्पराय़णः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
युधिष्ठिर उवाच
किंशीलः किंसमाचारो राज्ञोऽर्थसचिवो भवेत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
उमो उवाच
किंशीलाः किंसमाचाराः पुरुषाः कैश्च कर्मभिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
किंशीलाः किंसमुत्थानाः कथंरूपाश्च भारत |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
किंशुकाविव चोत्फुल्लौ व्यकाशेतां रणाजिरे ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
किंशुकाशोकवकुलपुंनागैरुपशोभितम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
किंसंनाहाः कथंशस्त्रा जनाः स्युः संय़ुगे नृप ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
किंसंस्थश्च भवेद्दण्डः का चास्य गतिरिष्यते ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
किङ्करः सर्वकारी च सर्वकर्मसु कोविदः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
किङ्करा भ्रातरः सर्वे मित्राः सम्वन्धिनस्तथा ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
किङ्कराः स्मोपतिष्ठन्ति सर्वाः सुवलजां तथा ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
किङ्कराणां ततः पश्चाच्चकार वलिमुत्तमम् ||
५ ग
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
किङ्करैः सह रक्षोभिरगृह्णात्सर्वमेव तत् ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
किङ्करोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद्रणम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
किङ्कष्टमनुपश्यामि फलं पापस्य कर्मणः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
किङ्किणीजालनद्धानां काञ्चनस्रग्वतां रवैः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
किङ्किणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
किङ्किणीशतनिर्घोषं वैय़ाघ्रपरिवारणम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
किङ्किणीशतनिर्घोषो युक्तस्तोमरकल्पनैः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
किङ्किणीशतसंह्रादो भ्राजंश्चित्रे रथोत्तमे ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिच्च विदुरेणोक्तो म्लेच्छवाचासि पाण्डव |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
किञ्चिच्चन्द्रविशुद्धात्मा किञ्चिच्चन्द्राद्विशेषवान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च |
६७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिच्छेषं च शिविरं तावकानां कृतं विभो |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिच्छेषा महाराज कृपणा समपद्यत ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् ||
८१ ग
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
किञ्चित्कारणमुद्दिश्य सोमोऽय़ं नीय़ते मय़ा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
किञ्चित्कालान्तरं दास्ये पुंलिङ्गं स्वमिदं तव |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
शिखण्ड्यु उवाच
किञ्चित्कालान्तरं स्त्रीत्वं धारय़स्व निशाचर ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
पुत्र उवाच
किञ्चित्किञ्चित्प्रतिवदंस्तूष्णीमासं मुहुर्मुहुः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
किञ्चित्प्रक्रिय़माणं वा कृतमात्रमथापि वा ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
किञ्चित्प्राणैश्च पुरुषैर्हतैश्चान्यैः सहस्रशः |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
किञ्चित्स्निग्धं यथा च स्याच्छुष्कचूर्णमभावितम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिदभ्युत्स्मय़न्कृष्णमिदं वचनमव्रवीत् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिदव्रुवतः काय़ाद्विचकर्तासिना शिरः ||
४७ ख