आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
अस्रं रेतः पुष्पफलानुपृक्त; मन्वेति तद्वै पुरुषेण सृष्टम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अस्रवद्रुधिरं भूरि स्वरसं चन्दनो यथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किं नु मां नात्र पीडय़ेत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
अस्वतन्त्रं हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
अस्वतन्त्रो हि पुरुषः कार्यते दारुय़न्त्रवत् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अस्वतो हि निवर्तन्ते ज्ञातय़ः सुहृदर्त्विजः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
अस्वर्ग्यमय़शस्यं च अधर्मिष्ठं च भारत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
अस्वर्ग्यमय़शस्यं च रक्षोवद्भरतर्षभ |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अस्वस्ति तस्य कुर्वन्ति देवाः साग्निपुरोगमाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अस्वस्ति तेभ्यः कुर्वन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
अस्वस्थं ह्यात्मनात्मानं लक्षय़ामि वराङ्गनाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
अस्वस्थनरनारीकमिदं वृष्णिपुरं भृषम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
अस्वस्थमवशं नित्यं जन्मसंसारमोहितम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षय़े मितभाषिणि ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
वसिष्ठ उवाच
अस्वाध्याय़परो लोके श्वानं च परिकर्षतु |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
अस्वामिकस्य स्वामित्वं यस्मिन्सम्प्रतिलक्षय़ेत् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
अस्वेदिनौ राजपुत्रस्य हस्ता; ववेपिनौ जातकिणौ वृहन्तौ |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अस्वेभ्यो देय़मेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अस्वो ह्यशक्तः पणितुं परस्वं; स्त्रिय़श्च भर्तुर्वशतां समीक्ष्य ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
अस्वोऽप्यनीशश्च तथैव राजं; स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
असय़ः प्रत्यदृश्यन्त वाससां नेजनेष्विव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
असय़ः शक्तय़ो भीमा गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
असय़ोऽत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
शर्मिष्ठो उवाच
अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
अहं कर्णश्च शल्यश्च कृपो हार्दिक्य एव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
अहं कर्ता च कार्यं च कारणं चापि नारद |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
अहं कर्तेति विदुर मावमंस्था; मा नो नित्यं परुषाणीह वोचः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
अहं कस्य कुतो वाहं कः को मे ह भवेदिति |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
अहं कामगमा वीर रक्षोवलसमन्विता |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अहं किं करवाणीति स राजवसतिं वसेत् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलय़स्तथा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
अहं केसरिणः क्षेत्रे वाय़ुना जगदाय़ुषा |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्व नु |
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
अहं खल्वपि सङ्ग्रामे शत्रूणां वशमागतः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
अहं गुरुर्महावाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
अहं गृहीत्वा राजानं सत्यधर्मपराय़णम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च कर्णं जानामि यथावद्भरतर्षभ |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
अहं च कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अहं च कृतवर्मा च कृपः शारद्वतस्तथा ||
४८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
अहं च कृतवर्मा च प्रय़ान्तं त्वां नरोत्तम |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अहं च क्रोष्टुकश्चैव यूय़ं चैवास्य वान्धवाः |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
अहं च क्षत्रिय़ो जातो न प्राप्तः क्षत्रसत्क्रिय़ाम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अहं च जानामि भविष्यरूपं; पश्यामि वुद्ध्या स्वय़मप्रमत्तः |
९५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च तत्करिष्यामि भीमार्जुनय़मैः सह |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
अहं च तत्करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
अहं च तव माता च राजन्यस्य महात्मनः |
१२ ख