उद्योग पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
अहं च तात कर्णश्च भ्राता दुःशासनश्च मे |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
अहं च तात कर्णश्च भ्राता दुःशासनश्च मे |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
अहं च तात कर्णश्च रणय़ज्ञं वितत्य वै |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
अहं च ते सदा पुत्र शान्तिस्वस्तिपराय़णा |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च ते सुन्दरि दासवत्स्थितः; सदा भविष्ये वशगो वरानने ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
अहं च ते स्वस्त्ययनं प्रय़ोक्ष्ये; यथा त्वमेनामधिरोक्ष्यसेऽद्य |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
लोमश उवाच
अहं च त्वं च कौन्तेय़ द्रक्ष्यामः श्वेतवाहनम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
अहं च त्वं च नृपते शत्रवः सुहृदश्च ते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
अहं च त्वानुपश्यामि ये चाप्यन्ये मनीषिणः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अहं च त्वानुय़ास्यामि भीमः कृष्णश्च मारिष ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
अहं च त्वानुय़ास्यामि सर्वे चान्धकवृष्णय़ः |
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
अहं च त्वाभिजानामि रणे शत्रून्विजेष्यसि ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
अहं च त्वाभिषेक्ष्यामि राजानं पृथिवीपतिम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
अहं च नकुलश्चैव लोमशश्च महातपाः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
अहं च निर्गुणोऽत्रेति सप्तैते मोक्षहेतवः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीय़ो मे महामुनिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अहं च पूजय़िष्ये त्वां समित्रगणवान्धवम् |
१२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अहं च प्रिय़कृद्राजन्सात्यकिश्च महारथः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
अहं च प्रीय़माणेन त्वय़ा देवकिनन्दन |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
द्रौपद्यु उवाच
अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान्परिपृच्छसि ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
अहं च रौहिणेय़श्च साम्वः शौरिसमो युधि ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
अहं च वहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्विधाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
अहं च विवुधाश्चैव त्वद्धिते निरताः सदा ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अहं च शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
अहं च संशय़ं प्राप्तः कृच्छ्रामापदमास्थितः |
९० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
अहं च सह पुत्रेण अध्रुवा इति चिन्त्यताम् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च वीर्यवान् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
अहं च सौरभेय़ी च समीची वुद्वुदा लता |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अहं चतुर्थः शिष्यो वै शुको व्यासात्मजस्तथा ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
अहं चान्ये च राजानो यच्च तत्क्षत्रमण्डलम् |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
अहं चापि कुरुश्रेष्ठा अर्जुनान्नावरः क्वचित् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
अहं चाप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अहं चाभिगतः पूर्वं त्वामद्य मधुसूदन |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
अहं चैनं प्रत्युदिय़ामाचार्यो वा धनञ्जय़म् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किञ्चन |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अहं छेत्स्यामि ते पाशं यदि मां त्वं न हिंससि ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अहं छेत्स्यामि ते पाशान्सखे सत्येन ते शपे ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अहं जरां समास्थाय़ राज्ये स्थास्यामि तेऽऽज्ञय़ा ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अहं जाने नैतदेवमिति राजन्पुनः पुनः ||
६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कर्ण उवाच
अहं जेष्यामि समरे सहितान्सर्वपाण्डवान् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अहं ज्ञास्यामि कौरव्य कालमस्य दुरात्मनः ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
अहं ज्याय़ानहं ज्याय़ानिति कन्येप्सय़ा तदा |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
११६
कुन्त्यु उवाच
अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
काश्यप उवाच
अहं तं नृपतिं नाग त्वय़ा दष्टमपज्वरम् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
अर्जुन उवाच
अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे; माद्रीसुतः सहदेवो जघन्यः |
९ क