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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
अहं तत्रावसं राजन्व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
अहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तन्वाभिनवय़ा युवा कामानवाप्नुय़ाम् ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
अहं तपस्वी वलवान्भूतभव्यभवत्प्रभुः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अहं तव ह्यन्तकरः सुहृद्वधकरस्तथा |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अहं तस्य पौरुषं पाण्डवस्य; व्रूय़ां हृष्टः समितौ क्षत्रिय़ाणाम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
शल्य उवाच
अहं तस्य भविष्यामि सङ्ग्रामे सारथिर्ध्रुवम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २८४
व्राह्मण उवाच
अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्त्वां निदर्शय़े |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अहं तु कदनं कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अहं तु तं त्रिंशता वज्रकल्पैः; समार्दय़ं निमिषस्यान्तरेण ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
अहं तु तत्करिष्यामि यथैनं प्रसहिष्यसि ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४४
शकुनिरु उवाच
अहं तु तद्विजानामि विजेतुं येन शक्यते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु तव तेषां च श्रेय़ इच्छामि भारत |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
अहं तु ताञ्शितैर्वाणैरनुनीय़ रणे वलात् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
अहं तु तान्कुरुवृषभानजिह्मगैः; प्रवेरय़न्यमसदनं रणे चरन् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
अहं तु तावत्पश्यामि कर्म यद्वर्तते कृतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
अहं तु त्वां व्रवीम्येतद्भक्तोऽसीति हितेप्सय़ा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
अहं तु नाभिधृष्णोमि यत्कृतं न मय़ा पुरा ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च सञ्जय़ |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
अहं तु पापय़ोन्यां वै प्रसूतः क्षत्रिय़र्षभ |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १०
सुरभिरु उवाच
अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु पुत्रो भगवान्पिता राजा गुरुश्च मे |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु प्रहृते पूर्वं प्रहरिष्यामि तेऽनघ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु प्रेषितो राजन्कौरवेण महात्मना |
१० क
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि; देतादृशे क्षत्रिय़संनिवेशे |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
अहं तु यत्नमास्थाय़ त्वदर्थे त्यक्तजीवितः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
अहं तु राज्ञः सुरथस्य पुत्रो; यं कोटिकाश्येति विदुर्मनुष्याः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
अहं तु विवुधश्रेष्ठं देवं त्रिभुवनेश्वरम् |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
अहं तु शरणं प्राप्तान्वर्तमानो यथावलम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रमुदितै रणे |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
अहं तु सर्वलोकस्य गत्वा छेत्स्यामि संशय़म् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु सर्वान्समय़ाननुजानामि भारत ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
अहं तु सोमकान्सर्वान्सपाञ्चालान्समागतान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २१८
स्कन्द उवाच
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
यक्ष उवाच
अहं ते जनकस्तात धर्मो मृदुपराक्रम |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
अहं ते दुहिता राजन्माधवी मृगचारिणी |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
अहं ते दय़ितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्ति स्वर्गं गमिष्यसि ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
अहं ते रक्षणं युद्धे करिष्यामि परन्तप |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
अहं ते राजशार्दूल कथय़ामि कथामिमाम् |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
अहं ते सङ्ग्रहीष्यामि हय़ाञ्शत्रुरथारुजः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अहं ते सर्वं भैक्षं गृह्णामि न चान्यच्चरसि |
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
कण्व उवाच
अहं ते सर्वमाख्यास्ये दर्शय़न्वसुधातलम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
तक्षक उवाच
अहं तेऽद्य प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं त्रिवर्त्मा सर्वात्मा सर्वलोकसुखावहः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात्पुत्रप्रीत्या सहामि तत् |
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अहं त्वज्ञासिषं पश्चात्स्वसोदर्यं द्विजोत्तम |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
अहं त्वदृश्यती नाम्ना तं स्नुषा प्रत्यभाषत |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
अहं त्वनेन नागेन्द्र सामपूर्वं समाहिता |
१५ क