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वन पर्व
अध्याय २३६
वैशम्पाय़न उवाच
अहं त्वभिद्रुतः सर्वैर्गन्धर्वैः पश्यतस्तव |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अहं त्ववध्यो मम चापि मातुलः; प्रशाधि राज्यं सह पाण्डवैश्चिरम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षय़िष्यामि मा शुचः ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अहं त्वां तारय़िष्यामि त्वं च मां तारय़िष्यसि ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
अहं त्वां निहनिष्यामि तिष्ठेदानीं ममाग्रतः ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
अहं त्वां मोक्षय़िष्यामि वासुके पन्नगोत्तम |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
अहं त्वां वर्धय़िष्यामि व्राह्मैर्मन्त्रैः सनातनैः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
भीम उवाच
अहं त्वानुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अहं त्वानुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महद्भय़म् |
७२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
युधिष्ठिर उवाच
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्णं धनञ्जय़ |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
अहं त्वामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अहं त्वामनुय़ास्यामि कृतवर्मा च सात्वतः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
अहं त्वामनुय़ास्यामि परान्विद्रावय़ञ्शरैः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अहं त्वामुद्धरिष्यामि प्राणाञ्जह्यां हि ते कृते ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपाय़तः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
अहं त्वय़ि मम त्वं च मय़ि ते तेषु चाप्यहम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अहं दत्त्वा वरान्प्रीतो निवृत्तिपरमोऽभवम् ||
६२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
दुर्योधन उवाच
अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशां पते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
अहं दानं प्रशंसामि भवानपि तपःश्रुते |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अहं दिव्याद्रथादेकः पातय़िष्यामि संय़ुगे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अहं दुःशासनः कर्णः शकुनिर्मातुलश्च मे |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
अहं दुरापो दुर्धर्षो दमनः पाकशासनिः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनञ्जय़ः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
अहं दौहित्रवान्स्यां वै वर एष मम प्रभो ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अहं द्रष्टा व्रह्मलोके सदेति; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११७ ख
वन पर्व
अध्याय १३
धृष्टद्युम्न उवाच
अहं द्रोणं हनिष्यामि शिखण्डी तु पितामहम् |
११८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
अहं द्रोणः कृपो द्रौणिः कृतवर्मा च सात्वतः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अहं द्रोणश्च शल्यश्च कृतवर्मा च सात्वतः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अहं द्रोणान्तकः पार्थ विहितः शम्भुना पुरा ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अहं धनञ्जय़ः पार्थः कृपः शारद्वतो द्विजः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अहं धनुष्मानसुरान्सुरांश्च; सर्वाणि भूतानि च सङ्गतानि |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं धाता विधाता च यज्ञश्चाहं द्विजोत्तम ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अहं धृतिरहं सिद्धिरहं त्विड्भूतिरेव च |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अहं ध्वजिन्यः शत्रूणां सहय़ाः सरथद्विपाः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
वसुमना उवाच
अहं न तान्वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र; सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददानि ते |
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
अहं न विस्मय़ं विप्र गच्छामीति प्रपश्य माम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं नाराय़णो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं नाराय़णो नाम शङ्खचक्रगदाधरः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अहं निधनमासाद्य लोकान्प्राप्स्यामि शाश्वतान् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अहं पतीन्नातिशय़े नात्यश्ने नातिभूषय़े |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
अहं पश्चादर्जुनमभ्यरक्षं; माद्रीपुत्रौ भीमसेनश्च चक्रे |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अहं पश्यामि विजय़ं कृत्स्नं भाविनमेव ते ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
अहं पारं समुद्रस्य पृथिव्या वा परं परात् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अहं पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरमारुजम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अहं पार्थान्हनिष्यामि सनितान्सर्वसोमकैः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अहं पार्थान्हनिष्यामि सपाञ्चालान्ससोमकान् ||
५४ ग
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञ; स्तत्रास सत्रं द्वादशवार्षिकं वै |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञो; न मे भय़ं सलिले मज्जितस्य |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
विश्वामित्र उवाच
अहं पुनर्वर्त इत्याशय़ात्मा; मूलं रक्षन्भक्षय़िष्याम्यभक्ष्यम् ||
७५ ख