द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनश्चान्यैस्त्रिभिः शरैः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनश्चैनं त्रिभिः शरैः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिस्त्रिभिः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वानदन्महानादं शार्दूल इव कानने ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विद्ध्वेषूणां त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
विद्म चैवं न वा विद्म शक्यं वा वेदितुं न वा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्म ते पुरुषव्याघ्र वचनं कुरुनन्दन |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
विद्म ते भावदोषेण यदर्थमिदमुच्यते |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
विद्मः कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन् |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
विद्मश्च त्वा ते च वय़ं च सर्वे; शुद्धात्मानं मध्यगतं सभास्थम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
विद्यते कारणं नान्यदिति मे नात्र संशय़ः ||
५३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
अर्जुन उवाच
विद्यते तं ममाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
विद्यते तु भय़ं तस्य यो नैतद्वेत्ति पार्थिव ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
विद्यते त्रिषु लोकेषु ततोऽस्म्यैकान्तिकं गतः |
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यते धार्तराष्ट्रस्य नृशंसस्य दुरात्मनः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यते न भय़ं चापि परलोकान्ममानघाः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
विद्यतेऽक्षरभावत्वादपरस्परमव्ययम् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
विद्यन्तेषां साहसिका गुणास्तेषामतीव हि |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशय़े |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
विद्यया जाय़ते नित्यमव्ययो ह्यव्ययात्मकः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विद्यया तात जानामि त्रिय़ुगं मधुसूदनम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
विद्यया तात सृष्टानां विद्यैव परमा गतिः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
विद्यया ह्यनय़ा राजन्वय़ं नृभ्यो विशेषिताः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
विद्या कर्म च शौर्यं च ज्ञानं च वहुविस्तरम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
विद्या ज्ञेय़ा नरश्रेष्ठ विधिश्च परमः स्मृतः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
विद्या तपश्च दानं च किमेतेषां विशिष्यते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा; सर्वमेतद्व्यवसाय़ेन शक्यम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विद्या राजन्न ते विद्या मम विद्या न हीय़ते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
विद्या वित्तं श्रुतं वापि न तद्गन्धर्व कामय़े ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च वलं धैर्यं च पञ्चमम् |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय़ व्रवीमि ते |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
नहुष उवाच
विद्यां प्रय़च्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
विद्यां यस्योपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्भृतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रिय़न्ते; प्रत्यासन्नं मनसा कर्मणा वा |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यां सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य; ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
विद्यातपोभ्यां हि भवान्भावितात्मा न संशय़ः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यातपोऽभितप्तानां तपसा भावितात्मनाम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
विद्यात्तु षोडशैतानि दैवतानि विभागशः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां; मुखे निवद्धां निरृतिं वहन्तम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां; मुखे निवद्धां निरृतिं वहन्तम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
विद्यादेवंविधेनैषां गुरुलाघवनिश्चय़म् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
विद्याद्राजा सर्वभूतानुकम्पां; देहत्यागं चाहवे धर्ममग्र्यम् ||
२ ख