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उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
अहं वै धार्तराष्ट्राणां कुर्यां तदफलं कथम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
अहं वै विपुले जातः कुले धनसमन्विते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अहं वै विस्मय़ं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् ||
१०५ ख
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
अहं वै श्येनमाय़ान्तमद्राक्षं विलमन्तिकात् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अहं वैकर्तनः कर्णश्चित्रसेनो विविंशतिः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
दुर्योधन उवाच
अहं वैकर्तनः कर्णो भ्राता दुःशासनश्च मे |
४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं वैश्रवणो राजा यमः प्रेताधिपस्तथा ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अहं व्याधस्तु भद्रं ते किं करोमि प्रशाधि माम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
अहं व्रह्मा आद्य ईशः प्रजानां; तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः |
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
शल्य उवाच
अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत्प्रभो |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अहं शल्याभिजानामि न त्वं जानासि तत्तथा ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३४
सूत उवाच
अहं शापे समुत्सृष्टे समश्रौषं वचस्तदा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं शिवश्च सोमश्च कश्यपश्च प्रजापतिः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय २२
भीमसेन उवाच
अहं शृणोमि ते वाचं त्वय़ा सैरन्ध्रि भाषिताम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अहं श्रद्धा च मेधा च सन्नतिर्विजितिः स्थितिः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
अहं स च क्षणेनैव निर्मनुष्यमिदं जगत् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ३८
तक्षक उवाच
अहं स तक्षको व्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
अहं स नागो विप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं संवर्तकः सूर्यो अहं संवर्तकोऽनिलः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं संवर्तको ज्योतिरहं सर्वर्तको यमः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
अहं संस्तम्भय़िष्यामि मा भैस्त्वं शक्रतो नृप |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
अहं सखा सुरेन्द्रस्य शक्रादनवमो रणे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
अहं सङ्कल्पजस्तस्य पुत्रः प्रथमकल्पितः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
अहं सञ्जीवय़ाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
अहं सञ्जीवय़िष्यामि किरीटितनय़ात्मजम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अहं सञ्जीवय़िष्यामि मृतं जातमिति प्रभो ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अहं सर्वत्रगो व्रह्मन्भूतग्रामान्तरात्मकः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अहं सर्वस्य सैन्यस्य पश्चात्स्थास्यामि पालय़न् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दय़ितः सखा |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
अहं सुय़ोधनं सङ्ख्ये हनिष्यामि न संशय़ः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
अहं सेनापतिस्तेऽद्य भविष्यामि न संशय़ः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अहं सेनाप्रणेता ते भविष्यामि न संशय़ः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
अहं सैरन्ध्रिवेषेण चरन्ती राजवेश्मनि |
१ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
अहं सौभपतेः सेनामाय़सैर्भुजगैरिव |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
अहं स्वर्गं न हीच्छेय़ं त्वय़्यप्रीते महेश्वर ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अहं स्वाहा स्वधा चैव संस्तुतिर्निय़तिः कृतिः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अहं हत्वा रणे कर्णं पुत्रं चास्य महारथम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अहं हनिष्यामि सदा परेषां; सहस्रशश्चाय़ुतशश्च योधान् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव; प्रसह्य येनाहितमाचरं वै ||
९० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अहं हन्ता पाण्डवानामनीकं; शाल्वेय़कांश्चेति ममैष भारः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
अहं हन्ता फल्गुनस्येति मोहा; त्कच्चिद्धतस्तस्य न वै तथा रथः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
अहं हि किन्दमो नाम तपसाप्रतिमो मुनिः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अहं हि क्षत्रहृदय़ं वेद यत्परिशाश्वतम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अहं हि जीवसञ्ज्ञो वै मय़ि जीवः समाहितः |
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
अहं हि ज्वलतां मध्ये मय़ूखानामिवांशुमान् |
३७ ख