अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
किमागमनमित्येवं राजा राजानमव्रवीत् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
किमाचारः कीदृशेषु पितामह न रिष्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
किमात्मकः कथम्भूतः कतिमूर्तिः कथम्प्रभुः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
पुत्र उवाच
किमाभरणकृत्यं ते किं भोगैर्जीवितेन वा ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
किमाभरणकृत्यं ते किं भोगैर्जीवितेन वा ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
किमाश्चर्यं कृतप्रज्ञः पुरुषोऽपि सुदारुणः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
किमाश्चर्यं च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
किमाश्चर्यं पुनर्मूढो धर्मकामोऽप्यपण्डितः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
किमाश्चर्यं यतः प्राज्ञो वहु कुर्याद्धि साम्प्रतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
४७
जनमेजय़ उवाच
किमासीत्पाण्डुपुत्राणां वने भोजनमुच्यताम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
किमासीदसि पानीय़ं नैतच्छक्यं वलात्त्वय़ा ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
किमाहरामि गुर्वर्थं व्रवीतु भगवानिति ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
किमाहारं प्रय़च्छामि कथं मुञ्चेद्भवानिमम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
किमाहाराः किमाचाराः क्व च वासो महात्मनाम् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
किमाहाराश्च ते तत्र ससैन्या न्यवसन्प्रभो |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
युधिष्ठिर उवाच
किमाहुर्दैवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
किमाहुर्भरतश्रेष्ठ पात्रं विप्राः सनातनम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
किमाहृत्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद्भुजङ्गम |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
किमाय़ुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
किमिच्छत्यभिसंरम्भाद्योत्स्यमानो युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
गङ्गो उवाच
किमिच्छसि महाराज मत्तः किं च ददानि ते |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुममानुषम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णीं भूते जनार्दने |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
किमिदं कुरुषे मौढ्याद्विप्रस्त्वं हि कुलोद्गतः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
किमिदं कुरुषे शेष प्रजानां स्वस्ति वै कुरु ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
किमिदं त्वं मम कृते उताहो वलिनः कृते |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं द्यूतकामेन मय़ा कृतमवुद्धिना |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामहे वय़म् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
किमिदं परमाश्चर्यं ध्याय़स्यमितविक्रम |
१ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलव्धव्या हि ते वय़म् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
किमिदं भवता प्राप्तमिहागमनजं फलम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
व्राह्मण उवाच
किमिदं भवति त्वं मां तिष्ठेत्युक्त्वा वराङ्गने |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं भृशदुःखार्तौ रोरवीथो अनाथवत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
किमिदं रोदिषि शुभे कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मय़हर्षवत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
किमिदं वर्तते पुत्रि क्रिय़तां तद्वचो मम ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
ऋषय़ ऊचुः
किमिदं वर्तते राजन्प्रय़त्नेन परेण च |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
किमिदं वर्तते व्रह्मन्किं च ते ह चिकीर्षितम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं वृजिनं सुभ्रु कृतं ते कामलुव्धय़ा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्कृतं कृतम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भामिनि |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
किमिदं साहसं राजंस्त्वय़ा व्याहृतमीदृशम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
किमिदं साहसं व्रह्मन्कृतवानसि साम्प्रतम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
किमिदानीं करिष्यामि मूढः कन्यामिमां प्रति |
१४ क