शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
उत्सवानां समाजानां क्रिय़ाः केतनजास्तथा ||
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सवे विहरिष्यन्ति धृतराष्ट्रस्य शासनात् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
उत्सवे वृत्तमात्रे तु त्रैलोक्याकाङ्क्षिणावुभौ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडितः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्ससर्ज गिरौ रम्ये हिमवत्यमरार्चिते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं सलक्षणम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
उत्ससर्ज धनुस्तूर्णं सन्दश्य दशनच्छदम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
उत्ससर्ज विषं तेषु सर्पो गोवृषभेष्विव ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्ससर्ज शितान्वाणानर्जुने क्रोधमूर्छितः ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्ससर्ज शिवं ध्याय़न्नस्त्रमस्त्रेण शाम्यताम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
वसिष्ठ उवाच
उत्ससर्ज स चैवाप उपय़ुङ्क्ते महोदधौ ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
उत्सहन्ते च ते वृत्तिमन्यामप्युपसेवितुम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
उत्सहन्ते रणे सोढुं कुपितं सव्यसाचिनम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं कुत एव नराधिपाः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मय़ेरितम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
उत्सहे तरसा जेतुं ततो गर्जामि गौतम ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सहेत युधा जेतुं यो नः शत्रुनिवर्हण ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
उत्सहेदिह कर्तुं हि कोऽन्यो वै च्यवनादृते ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
उत्सहेम रणे जेतुं सेन्द्रानपि सुरासुरान् ||
३५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
उत्सहेरंश्च ये हन्तुं भूतग्रामं चतुर्विधम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
उत्साः पुलिन्दाः शवराश्चूचुपा मण्डपैः सह ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सादनमृते तेषां वनस्थानां मम द्विषाम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
उत्सादनार्थं लोकानां धुन्धुर्नाम महासुरः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
विष्णुरु उवाच
उत्सादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति मुनीनिह ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
उत्सादितः कषाय़ेण वलवद्भिः सुशिक्षितैः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
उत्सादितश्च विषय़ः काशीनां रत्नसञ्चय़ः ||
४७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
उत्सादय़ति यः सर्वं यशसा स विय़ुज्यते |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्सादय़िष्यति तदा सर्वान्म्लेच्छगणान्द्विजः ||
९३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
उत्सादय़ेल्लोकमिमं प्रवृद्धः; श्वेतो ग्रहस्तिर्यगिवापतन्खे ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
उत्सारय़न्तः प्रभय़ा तमस्ते चन्द्ररश्मय़ः |
४५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
उत्साहश्च कृतो नित्यं मय़ा दिष्ट्या युय़ुत्सता |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
उत्साहश्चानहङ्कारः परमं सौहृदं क्षमा ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
उत्सीदन्ति स्वधर्माश्च तत्राधर्मेण पीडिताः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
उत्सीदन्ते सय़ज्ञाश्च केवला धर्मसेतवः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
उत्सीदेरन्प्रजाः सर्वा न कुर्युः कर्म चेद्यदि |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
उत्सीदेय़ुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सुका नगरं द्रष्टुं भविष्यन्ति पृथा तथा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
उत्सूर्यशाय़िनश्चासन्सर्वे चासन्प्रगेनिशाः |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृजध्वं महावीर्यान्धृतराष्ट्रसुतानिमान् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
उत्सृजन्तं तु तं रेतः स गर्भस्थोऽभ्यभाषत ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृजन्तो विषं घोरं निश्चेरुर्ज्वलिताननाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
उत्सृजन्तौ महेष्वासौ शरवृष्टीः समन्ततः ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
उत्सृजन्परिगृह्णंश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
शल्य उवाच
उत्सृजेय़ं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
उत्सृजैनमहं वैनमेष मां वा हनिष्यति ||
५९ ख