सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात्सिंहस्य खादतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
सा हि श्रान्तं क्षुधार्तं च जानीते मां तपस्विनी ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
कन्यो उवाच
सा हृता तेन भगवन्मुक्ताहं त्वद्वलेन तु |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
सा हृष्टरूपैव तु राजपुत्री; तस्या वचः साध्वविशङ्कमाना |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
सा हेमचित्रा महती पाण्डवेन प्रवेरिता |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सा हैमं रथमास्थाय़ स्थविरैः सचिवैर्वृता |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सा ह्यग्रेऽगच्छत तय़ोर्दम्पत्योर्हतपुत्रय़ोः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
सा ह्यस्य प्रकृतिर्दृष्टा तत्क्षय़ान्मोक्ष उच्यते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
सा हय़ान्सारथिं चैव रथं चास्य महास्वना |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सांनिध्यं चैव राजेन्द्र रुद्रपत्न्याः कुरूद्वह |
१४८ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सांनिध्यं पुष्करे येषां त्रिसन्ध्यं कुरुनन्दन ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सांनिध्यमकरोत्तत्र भार्गवप्रिय़काम्यया ||
११७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
सांनिध्यमाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ||
१९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सांवत्सरा ज्योतिषि चापि युक्ता; नक्षत्रय़ोगेषु च निश्चय़ज्ञाः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सांवास्यकं करिष्यामि नास्ति ते मृत्युतो भय़म् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
जनक उवाच
साकल्यं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
साकाशजलपातालां सपर्वतमहावनाम् |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षाच्चात्र न्यवसत्कार्त्तिकेय़ः; सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षात्कुवेरेण कृताश्च तस्मि; न्नगोत्तमे संवृतकूलरोधसः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
साक्षात्कृत्स्नो धनुर्वेदः समुपस्थास्यतेऽनघ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
साक्षात्तं दर्शय़ामास सोऽदृश्योऽन्येन केनचित् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षात्त्र्यक्षान्वसवो वाथ दिव्या; नादित्यान्वा सर्वगुणोपपन्नान् |
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
साक्षात्पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
साक्षात्पितामहो व्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
साक्षात्प्रीतस्तदा धर्मो दर्शय़ामास तं द्विजम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षात्स विवुधारिघ्नः क्षत्रे नाराय़णो विभुः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श; सरस्वतीं मानुषदेहरूपाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसम्पदा ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
साक्षाद्ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारय़त् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षाद्ददर्श यो देवान्सर्वाञ्शक्रपुरोगमान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
साक्षाद्दर्शनमेतेषामीश्वराणां नरो भुवि ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७१
युधिष्ठिर उवाच
साक्षाद्दृष्टः सुय़ुद्धेन तोषितश्च त्वय़ानघ ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
जनमेजय़ उवाच
साक्षाद्दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
साक्षाद्देवानपाहाय़ वृतो यः स मय़ा पुरा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षाद्धर्मादय़ं पुत्रस्तस्य जातो युधिष्ठिरः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
साक्षाद्धैमवतः पुण्यो विमलः कमलाकरः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
साक्षाद्यत्रापिवत्सोममश्विभ्यां सह कौशिकः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षाद्रामेण यो वाल्ये धनुर्वेद उपाकृतः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षाद्वृहस्पतेः शिष्यो महावुद्धिर्महाय़शाः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
साक्षान्नेह मनुष्यस्य पितरोऽन्तर्हिताः क्वचित् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
साक्षान्मघवता सृष्टः सम्प्राप्स्यति धनञ्जय़ः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
साक्षाल्लोकगुरुर्व्रह्मा पद्मे सूर्येन्दुसप्रभे ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वय़ं त्रीन्परिवत्सरान् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावनाः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
साक्षिवत्पुण्यपापेषु सत्यं व्रूहि कवे वचः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
सागच्छत्त्वरिता भूमिं वासस्तदभिलिङ्गती |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
सागरः प्लवगेन्द्रेण क्रमेणैकेन लङ्घितः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः ||
१२१ ख