स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
अहो धिग्दुःशलां पश्य वीतशोकभय़ामिव |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
पौरा ऊचुः
अहो धिग्धृतराष्ट्रस्य वुद्धिर्नातिसमञ्जसी |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अहो धिग्यदधो नाभेः प्रहृतं शुद्धविक्रमे |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
सभासद ऊचुः
अहो धिग्वान्धवा नैनं वोधय़न्ति महद्भय़म् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अहो धिङ्न स जानाति जीवतोऽस्मान्नराधिपः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
अहो नाराय़णं तेजो दुर्दर्शं द्विजसत्तम ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अहो नाशंससे किञ्चित्पुंस्त्वं क्लीव इवात्मनि |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
अहो नासीत्पुमान्कश्चिद्दृष्ट्वा द्रोणं व्यवस्थितम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अहो नु धिग्वलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्रताम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
अहो नु मम वालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
अहो नु रमणीय़स्त्वमहो चासि मनोरमः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अहो नु वलवद्दैवं कालश्च दुरतिक्रमः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अहो नैनं भवान्वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अहो पार्थ निमित्तानि विपरीतानि पश्यसि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
अहो पुत्रविय़ोगेन मृतशून्योपसेवनात् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
अहो प्रभावः सुमहानासीद्वै सुमहात्मनोः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
अहो प्रभावो व्रह्मर्षेश्च्यवनस्य महात्मनः |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः |
४६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अहो भवत्या मन्त्रस्य पिधानेन वय़ं हताः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अहो भीमे वलं भीममेतय़ोश्च कृतास्त्रता ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
अहो मन्दीकृतः स्नेहो गृध्रेणेहाल्पमेधसा |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अहो मम मतं यत्तन्निवोधत नराधिपाः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अहो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् |
१०३ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अहो मूढाः स्म सुचिरमिमं कालमचेतसः |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अहो मे भवतो दृष्टं हृदय़ं गमनं प्रति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अहो युद्धप्रतीपानि युद्धकाल उपस्थिते |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
अहो रात्रिः समाजज्ञे निद्रान्धानां विशेषतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
अहो रामस्य वार्ष्णेय़ शक्रस्येव महात्मनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्यं महात्मनः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अहो वः पौरुषं नास्ति न च वोऽस्ति पराक्रमः |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
अहो वत कृतं पापं मय़ेदं क्षत्रकर्मणा ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अहो वत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
अहो वत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अहो वत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वय़म् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
अहो वत महत्पापं सावित्र्या नृपते कृतम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
अहो वत महद्दुःखं यत्र पाण्डुसुतान्रणे |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अहो वत महद्दुःखं यदहं पाण्डवान्रणे |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अहो वत महद्दुःखं वेदनाशनजं मम |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अहो वत महद्भूतं स्वय़म्भूर्यदिदं स्वय़म् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
अहो वत यथेदं मे कष्टं दुश्चरितं कृतम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अहो वत विविग्नाः स्म निधनेन महात्मनः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अहो वतासि कुशलो वुद्धिमानिति विस्मितः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
ऋषय़ ऊचुः
अहो वताय़ं शकुनिर्विघसाशान्प्रशंसति |
६ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अहो वताय़मगमः श्रीमानस्मिन्वनान्तरे |
९८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
अहो विज्ञानमित्येवं तपसा पूजितस्ततः ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
अहो विनिकृतो लोको लोभेन च वशीकृतः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतय़ोः |
३० क