वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
न हि त्वय़ा सदृशी काचिदस्ति; विभ्राजसे ह्यतिमात्रं यथा श्रीः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
न हि दारा न मित्राणि ज्ञातय़ो न च वान्धवाः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
न हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवति भारत |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
न हि दुःखं समाप्नोषि सैरन्ध्री यदुपाश्नुते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
न हि दुःखेषु शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति चर्द्धिषु |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
न हि दुर्योधनस्तानि पश्यते भरतर्षभ |
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
धृतराष्ट्र उवाच
न हि दुर्योधनो मन्दः पुरा प्रोक्तमवुध्यत |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
न हि दुर्योधनो राज्यं मधुरेण प्रदास्यति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
न हि दुर्वलदग्धस्य कुले किञ्चित्प्ररोहति |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
न हि दुर्वलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीय़ते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
न हि दुश्चरितं किञ्चिदन्तरात्मनि पश्यति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
न हि दुश्चरितं किञ्चिदात्मनोऽन्येषु पश्यति ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भीष्म उवाच
न हि देवा न गन्धर्वा न मनुष्या भगीरथ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
न हि देवा न गन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
सूर्य उवाच
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च पन्नगाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
न हि देवेषु वा पूर्वं दानवेषूरगेषु वा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
न हि देवेष्वहं स्थाता न मनुष्येषु कर्हिचित् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
देव्यु उवाच
न हि देवोदरात्कश्चिन्निःसृतो नाशमर्छति ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
न हि दैवाद्गरीय़ो वै मानुषं कर्म कथ्यते ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
न हि दैवेन सिध्यन्ति कर्माण्येकेन सत्तम |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
न हि दोषो गुणो वेति निस्पृक्तस्तेषु दृश्यते ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
न हि द्रोणसुतः सङ्ख्ये निवर्तेत कथञ्चन ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि द्वैतवने किञ्चिद्विद्यतेऽन्यत्प्रय़ोजनम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि धर्मं परं जातु नाववुध्येत पार्थिव |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न हि धर्मः स्मृतो राजन्क्षत्रिय़स्य प्रतिग्रहः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
न हि धर्मफलैस्तात न तपोभिः सुसञ्चितैः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
न हि धर्ममविज्ञाय़ युक्तं गर्हय़ितुं परम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
न हि धर्ममविज्ञाय़ वृद्धाननुपसेव्य च |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
न हि धर्मविदः प्राहुः प्रमाणं वाक्यतः स्मृतम् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
न हि धर्मविभागज्ञः कुर्यादेवं धनञ्जय़ ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि धर्मादपैत्यर्थः कामो वापि कदाचन ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
न हि धर्मो महाराज क्षत्रिय़स्य वनाश्रय़ः |
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
न हि धर्मोऽस्ति ते भीष्म व्रह्मचर्यमिदं वृथा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
न हि नः क्षत्रिय़ाः केचिन्न लोकाः सप्त पुत्रक |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
न हि नः प्रीणय़ेद्द्रव्यं न देवत्वं कुतः सुखम् |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
न हि नस्तत्तपस्तस्य तारय़िष्यति सत्तम |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
न हि नस्तमृते वीरं रमणीय़मिदं वनम् ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
न हि नाशोऽस्ति वार्ष्णेय़ कर्मणोः शुभपापय़ोः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
न हि निर्वेदमागम्य किञ्चित्प्राप्नोति शोभनम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
न हि नो भ्रूणहा कश्चिद्राजापथ्योऽनृतोऽपि वा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
न हि नो व्रह्मशप्तानां शेषो भवितुमर्हति |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि पक्षवता न्याय़्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
न हि परमिह दानमस्ति गोभ्यो; भवन्ति न चापि पराय़णं तथान्यत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिदहिंसय़ा |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
न हि पश्यामि तं लोके गदाहस्तं नरोत्तमम् |
११ क