chevron_left  चापवेगाय़तस्तीक्ष्णःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
चापवेगाय़तस्तीक्ष्णः परकाय़ावदारणः |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिनः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
चापव्यात्ताननं घोरमसिजिह्वं दुरासदम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
चापशव्दं महत्कृत्वा तलशव्दं च भैरवम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
चापादाधिरथेर्मुक्ताः प्रपतन्तः स्म साय़काः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि; शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खाः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
चापानि विशिखान्पीतान्निस्त्रिंशान्विमला गदाः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
चापैश्च वहुधा छिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
चापैश्च विशिखैश्छिन्नैः शक्त्यृष्टिप्रासकम्पनैः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
चामरव्यजनाक्षेपैरुदय़न्निव भास्करः ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
चामरव्यजने चास्य वीरौ जगृहतुस्तदा |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
चामरव्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ |
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
चामरापीडकनिभाः श्वेतलोहितराजय़ः |
१०१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
चामरापीडकवचाः स्रस्तान्त्रनय़नासवः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
चामरापीडिनः सर्वे जाम्वूनदविभूषिताः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
चामरे चापि वाय़ुश्च गृहीत्वाग्निश्च विष्ठितौ ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
श्रीकृष्ण उवाच
चामरैर्व्यजनैश्चित्रैर्ध्वजैश्चाश्वरथद्विपैः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
चामरैश्च कुथाभिश्च तूणीरैः पतितैरपि ||
१०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
चामरैश्च कुथाभिश्च प्रविद्धैश्चाम्वरोत्तमैः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
चारः सुविहितः कार्य आत्मनोऽथ परस्य च |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
चारणाः प्रेक्ष्य संहृष्टास्त्वदीय़ाश्चाप्यपूजय़न् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
चारणैः स्तूय़मानौ तु जग्मतुः परय़ा मुदा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
चारनेत्रः परावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
चारभूमिष्वभिगमान्पाशांश्च परिवर्जय़ेत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
चारमन्त्रवलादानैः सामदानविभेदनैः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचय़ेषु च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
चारश्च प्रणिधिश्चैव काले दानममत्सरः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
चारश्च विविधोपाय़ः प्रणिधिश्च पृथग्विधः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
चारांश्च नचरान्विद्यात्तथा वुद्ध्या न सञ्ज्वरेत् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
चारांश्च विद्यात्प्रहितान्परेण भरतर्षभ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
चारान्मन्त्रं च कोशं च मन्त्रं चैव विशेषतः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
चारान्सम्प्रेषय़ामासुः समन्तात्तद्रणाजिरम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
चारित्रनिय़ता राजन्ये कृशाः कृशवृत्तय़ः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
चारित्रपरमो वुद्धो व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
चारित्रमात्मनः पश्यंश्चन्द्रशुद्धमनामय़म् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
चारुचित्रं सुवर्माणं दुष्कर्णं कर्णमेव च |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
चारुचित्रः सुचारुश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
चारुदेष्णश्च दुर्धर्षस्तथैव गदसारणौ |
२० क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
चारुदेष्णश्च विक्रान्तो झिल्ली विपृथुरेव च |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
चारुदेष्णश्च साम्वश्च प्रद्युम्नश्च महारथः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
चारुदेष्णेन संसक्तो विविन्ध्यो नाम दानवः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
चारुदेष्णेन साम्वेन गदेन कृतवर्मणा ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
चारुनेत्रा घृताची च मेनका पुञ्जिकस्थला ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
चारुपद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
चारुरूपाः सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
चारुश्रवाश्चारुय़शाः प्रद्युम्नः शम्भुरेव च ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
चारुसर्वानवद्याङ्गि पद्मेन्दुसदृशानने ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
चारुस्रङ्मुकुटोष्णीषैर्मणिरत्नविराजितैः |
२९ क