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वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
दुष्प्रापं विप्रमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
दुष्प्रापा परमा सिद्धिरगम्या कामगोचरैः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
दुस्तीर्था चानभिज्ञेय़ा वार्षिकी नाष्टमासिकी |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
दुहिता कुन्तिभोजस्य कृते पित्रा स्वय़ंवरे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
दुहिता जनकस्यापि वैदेही यदि ते श्रुता |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसम्पदा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २११
अर्जुन उवाच
दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
दुहितान्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
दुहितुः स्वय़ंवरे राजन्सर्वक्षत्रसमागमे ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
यय़ातिरु उवाच
दुहितुर्दानवेन्द्रस्य धर्म्यमेतत्कृतं मय़ा ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
शुक्र उवाच
दुहितुर्नाप्रिय़ं सोढुं शक्तोऽहं दय़िता हि मे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
दुहितुर्वचनाद्राजा सोऽगस्त्याय़ महात्मने |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
दुहितुर्विप्रलम्भं तं धात्रीणां वचनात्तदा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
ऋचीक उवाच
दुहितुर्व्रूह्यसंसक्तो मात्राभूत्ते विचारणा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
दुहितुस्तमभिप्राय़मन्वजानाच्च पार्थिवः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
दुहितृत्वमनुप्राप्ता गङ्गा यस्य महात्मनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
दुहितृत्वे च नृपतिर्गङ्गां समनुकल्पय़त् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दुहित्रा चैव सहितं ददर्श विकृताननम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
सुरभ्यु उवाच
दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
दुह्येद्धेनुः कामधुक्च भूमिः सम्यगनुष्ठिता ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
दूतं प्रस्थापय़ामास द्रुपदस्य निवेशने ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
दूतः प्रय़ातो नगरं दाशार्णनृपचोदितः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
दूतः समर्थः प्रशमाय़ तेषां; राज्यार्धदानाय़ युधिष्ठिरस्य ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
दूतकर्मणि युक्तश्च स्थविरश्च विशेषतः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
दूतश्च हि हृषीकेशः सम्वन्धी च प्रिय़श्च नः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
दूतश्चापि यथावृत्तं धार्तराष्ट्रे न्यवेदय़त् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
दूतसामर्थ्ययोगश्च राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
दूतस्य हन्ता निरय़माविशेत्सचिवैः सह ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
दूतीं प्रस्थापय़ामास नैषधान्वेषणे नृप ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
दूतैः शीघ्राश्वसंय़ुक्तैरवहारमकारय़न् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापय़त् ||
४७ ग
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापय़त् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
दूतैर्मधुरसम्भाषैर्नैतदस्तीति सन्दिशन् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
दूतो देवानामव्रवीदुग्ररूपो; ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
दूतो नस्तूर्णमाय़ातः सैन्धवैः साधुवाहिभिः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
दूरं गत्वा विजानाति श्रेय़ो वृष्णिकुलोद्वह ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
दूरं च यातं राजानमन्वगच्छज्जनार्दनः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
दूरं चाहमभ्यागतः |
१६० घ
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
दूरं न शक्यं तत्रासीद्गन्तुमश्वेन केनचित् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
दूरगं वहुधागामि प्रार्थनासंशय़ात्मकम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
दूरगं वहुधागामि प्रार्थनासंशय़ात्मकम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
दूरतो गुणदोषौ हि प्राज्ञः सर्वत्र पश्यति ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
दूरपाती दृढेषुश्च निमित्तज्ञश्च पाण्डवः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
दूरपाती महेष्वासः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः |
२ क