शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
अय़ं मे धास्यति श्रेय़ो वपुरेतद्धि तादृशम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
अय़ं मे न शृणोतीति तस्मिन्राजा प्रधारय़ेत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
अय़ं मे नाहुष सखा गालवस्तपसो निधिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अय़ं मे पुत्रो न किञ्चिदपराध्यति |
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
अय़ं मय़ा पाण्डवानां धनुर्धरः; पराजितः पाण्डवः सव्यसाची |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
अय़ं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र; वृहस्पतेरवरो जन्मना यः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अय़ं राजकुले जातो विदिताभ्यन्तरो मम ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं राजन्व्रवीम्येतद्यत्तद्गुह्यं विभावसोः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
अय़ं लोकः सुपर्णानां पक्षिणां पन्नगाशिनाम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
अय़ं लोकोऽक्षय़स्तेषां यथैव मम कामधुक् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
व्राह्मण्यु उवाच
अय़ं वः प्रणिपातेन तुष्टो दृष्टीर्विमोक्ष्यति ||
६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं वः फल्गुनो भ्राता गाण्डीवं परमाय़ुधम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
अय़ं वकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो मम |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं वत्से महाभागो व्राह्मणो वस्तुमिच्छति |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं वलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं वहुधनो राजन्सागरावर्तसम्भवः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अय़ं वा गच्छतु रणे तस्य युद्धाय़ दुर्मतेः |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं वै कीदृशस्तेन मम दत्तो महात्मना |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
अय़ं वै जननाद्विप्रः सुहृत्तस्य महात्मनः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
अय़ं वै त्वा याजय़िता वृहस्पति; स्तथामरं चैव करिष्यतीति ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
अय़ं वै दानवो व्रह्मन्निल्वलो वसुमान्भुवि |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
अय़ं वै नहुषः श्रीमान्देवराज्येऽभिषिच्यताम् |
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
अर्जुन उवाच
अय़ं वै सत्यजिद्राजन्नद्य ते रक्षिता युधि |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अय़ं वो रोचतां धर्म इति वाच्यः प्रय़त्नतः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अय़ं व्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं व्रह्मविदां श्रेष्ठो अय़ं व्रह्मविदां गतिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अय़ं व्रह्मादिभिः सिद्धैर्गुहाय़ां गोपितः प्रभुः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं शान्तनवः सत्यं पालय़न्सत्यविक्रमः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
वासुकिरु उवाच
अय़ं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथानघाः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं श्यामो महावाहुः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
अय़ं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
अय़ं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम् ||
३३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं श्वा भक्त इत्येव त्यक्तो देवरथस्त्वय़ा |
२० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह |
७ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अय़ं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यः काङ्क्षितस्तव |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यः काङ्क्षितस्त्वय़ा |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
४९
जरत्कारुरु उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो भय़ान्नस्त्रातुमर्हसि |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
द्रौणिरु उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मे जनार्दन |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो वर्षपूगाभिकाङ्क्षितः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स दिवसस्तात यत्र पार्थो महारथः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अय़ं स देवय़ानानामादित्यो द्वारमुच्यते |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स द्विषतां मध्ये मृगाणामिव केसरी |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अय़ं स पुरुषः श्यामो लोकस्य दुरतिक्रमः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अय़ं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स पुरुषव्याघ्रः पुनराय़ाति धर्मवित् |
१७ क