शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
अकामद्वेषसंय़ुक्तस्त्रिभिः शुक्लैः समन्वितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
अकामद्वेषसंय़ुक्तास्ते सन्तो लोकसत्कृताः ||
८८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अकामद्वेषसंय़ोगाद्द्रोहाल्लोभाच्च भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अकामद्वेषय़ुक्तस्य दण्डनीत्या युधिष्ठिर |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
अकामफलसंय़ोगात्प्राप्नुवन्ति परां गतिम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
अकामस्येव कृष्णस्य सा व्यतीय़ाय़ शर्वरी ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
अकामहत इत्येष सतां धर्मः सनातनः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अकामा इव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
पिङ्गलो उवाच
अकामाः कामरूपेण धूर्ता नरकरूपिणः |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अकामाः संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अकामात्मा समवृत्तिः प्रजासु; नाधार्मिकाननुरुध्येत कामान् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अकामात्मापि हि सदा धुरमुद्यम्य चैव हि ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अकामानां च सर्वेषां सुहृदामर्थदर्शिनाम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अकामान्कामय़ति यः कामय़ानान्परिद्विषन् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
युधिष्ठिर उवाच
अकामाश्च सकामाश्च हता येऽस्मिन्महाहवे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
अकामाय़ाः कृतं तत्र यज्ञे होत्रानुमार्गतः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
अकामेय़मिहानीता पुनश्चैव विसर्जिता ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुय़ात् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
व्राह्मण उवाच
अकामो वा सकामो वा न स नैष्यति ते वशम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
अकामो वा सकामो वा स ते वशमुपैष्यति ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
अकाम्यान्कामय़ानोऽर्थान्पराचीनानुपद्रुतान् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
अकामय़ानस्य च सर्वकामा; नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
अकामय़ानेन तदा शरीरत्राणमिच्छता ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अकामय़ानेन मय़ा विशिखैरर्दितो भृशम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अकारणकृतान्येव तेषां वः फलमागतम् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
अकारणभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अकारणाद्रुषा तात पुण्यस्थानात्परिच्युताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
अकारणेऽभिशस्तोऽसि तेनासि हरिणः कृशः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
अकारणो हि नेहास्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
अकार्पण्यमसंरम्भः क्षमा धृतिरहिंसता |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः प्रिय़वादिता |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः श्रद्दधानता ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः श्रद्दधानता ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
अकार्यं कृतवानस्मि रागद्वेषवलात्कृतः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अकार्यं कृतवान्पापो योऽदशत्पितरं तव ||
१८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
अकार्यं ते कृतं राजन्क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
अकार्यं नहुषाकार्षीर्लप्स्यामस्त्वत्कृते भय़म् ||
४६ ग
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अकार्यकरणाद्भीतः कार्याणां च विवर्जनात् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अकार्यमपि त्वय़ा कार्यमिति ||
९० घ
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अकार्यमपि यज्ञार्थं क्रिय़ते यज्ञकर्मसु |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
अकार्यमपि येनेह प्रय़ुक्तः सेवते नरः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
अकार्यमसकृत्कृत्वा दृश्यन्ते ह्यधना नराः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अकार्यमिति चैवेमं नात्मानं सन्त्यजाम्यहम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अकार्याणां च कार्याणां संय़ोगं यः करोति वै |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
अकार्याण्यपि वक्ष्यामि यानि तानि निवोध मे |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
अकार्षमहमज्ञानादय़ं वा वभ्रुवाहनः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
अकार्षीः समय़भ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ||
२२ ख