अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अटवीपर्वताश्चैव नदीतीर्थानि यानि च |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
अटवीवलं भृतं चैव तथा श्रेणीवलं च यत् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अटवीशवराश्चैव मरुभौमाश्च मारिष ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
अटवीष्वपरः कार्यः सामन्तनगरेषु च ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
अटव्यां च सुघोराय़ां तृष्णार्तो नष्टचेतनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः |
५१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अट्टाट्टालकसम्वाधं षट्पथं सर्वतोदिशम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अट्टैर्महद्भिः संय़ुक्तं व्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अणकैश्च शिलाधौतैर्वज्राशनिविषोपमैः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानं ज्योतिरव्ययम् ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ||
४२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु कथ्यते ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अणीमाण्डव्य इति वै विख्यातः सुमहाय़शाः ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
अणीय़रूपं क्षुरधारय़ा त; न्महच्च रूपं त्वपि पर्वतेभ्यः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
अणीय़सामणीय़ांसं वृहद्भ्यश्च वृहत्तरम् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अणीय़सामणीय़ांसं स्थविष्ठं च स्थवीय़साम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अणीय़ान्क्षुरधाराय़ा गरीय़ान्पर्वतादपि ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
अणु वा यदि वा स्थूलं विदितं साधुकर्मभिः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
अणुमात्रेण वपुषा पद्मतन्त्वाश्रितं प्रभुम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अणुरप्यपचारश्च नास्त्यस्माकं नराशन ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अणुर्वृहच्छिरा भूत्वा वृहच्चाणुशिराः पुनः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अणुर्वृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् |
१०३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
अणोरणीय़ान्सुमनाः सर्वभूतेषु जागृमि |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
अणोरणीय़ो महतो महत्तरं; तदात्मना पश्यति युक्त आत्मवान् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
अण्डं विभेद विनता तत्र पुत्रमदृक्षत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अण्डजा जन्तवो ये च सर्वे चापि चतुष्पदाः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अण्डजा भीष्म तस्यान्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
अण्डजातं तु व्रह्माणं केचिदिच्छन्त्यपण्डिताः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अण्डजानि विजानीय़ात्सर्वांश्चैव सरीसृपान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
अण्डजे जन्मनि पुनर्व्रह्मणे हरिय़ोनय़े |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजराय़ुजमथापि च |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अण्डभक्षणमशुचि ते; कर्म वाचमतिशय़ते ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अण्डमेतज्जले न्यस्तं दीप्यमानमिव श्रिय़ा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
अण्डाद्भिन्नाद्वभुः शैला दिशोऽम्भः पृथिवी दिवम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अण्डानि विभ्रति स्वानि न भिन्दन्ति पिपीलिकाः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
अण्डाभ्यां विनताय़ास्तु मिथुनं न व्यदृश्यत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्रजाय़न्त शकुन्तकाः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
अत ऊर्ध्वं कुमारः स स्वर्णष्ठीवी महाय़शाः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं जनपदान्निवोध गदतो मम |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
जनमेजय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं ततो व्रह्मन्किमकुर्वत पाण्डवाः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
७६
नल उवाच
अत ऊर्ध्वं तु भूय़स्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अत ऊर्ध्वं तु विज्ञेय़मानुशासनमुत्तमम् |
२०१ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अत ऊर्ध्वं तु वीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
२५७
जनमेजय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अत ऊर्ध्वं निवोधेदं देवानां यष्टुमिच्छताम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि निय़तं धर्मलक्षणम् |
१९ क