आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स पुरुषव्याघ्रो रणेऽद्भुतपराक्रमः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं स भगवान्देवः पितामह जनार्दनः |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स रथ आय़ाति योऽय़ासीत्पाण्डवान्प्रति |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स रथ आय़ाति श्वेताश्वः कृष्णसारथिः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स रथ आय़ाति श्वेताश्वः कृष्णसारथिः |
३८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
अय़ं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स वैकर्तन युद्धकालो; विदर्शय़स्वात्मवलं महात्मन् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अय़ं स सत्यकामानां सत्यलोकः परः सताम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
अय़ं समागमो देव देव्या सह तवानघ |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं समाजः सुमहान्रमणीय़तमो भुवि |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
अय़ं सराष्ट्रो नृपतिर्मा भूदिति ततोऽगमत् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं सहस्रसमितो वैय़ाघ्रः सुप्रवर्तितः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
शक्र उवाच
अय़ं सुतस्ते द्विजमुख्य नाग; श्चाघ्राय़ते त्वामभिवीक्षमाणः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अय़ं सौभं योधय़ामास खस्थं; विभीषणं माय़या शाल्वराजम् |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं स्त्रीपूर्वको राजञ्शिखण्डी यदि ते श्रुतः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
अय़ं हरिसहस्रेण युक्तं जैत्रं रथोत्तमम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
अय़ं हर्यश्वय़ुग्जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
अय़ं हि कालः सम्प्राप्तो धार्तराष्ट्रोपजीविनाम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं हि धर्मप्रभवो नरेन्द्रो; धर्मे रतः सत्यधृतिः प्रदाता |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़ं हि धर्मसंय़ुक्तो रूपवान्गुणसागरः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अय़ं हि नित्यः परमो महर्षि; र्महाविभूतिर्गुणवान्निर्गुणाख्यः |
८८ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
अय़ं हि मां दृढं क्षुद्रः कौरवाणां यशोहरः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
अय़ं हि लोको मानस्य असौ मानस्य तद्विदुः ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं हि वासोदय़ ईदृशानां; मनस्विनां कौरव मा भवेद्वः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अय़ं हि विमलो व्यक्तमहमीदृशकस्तथा ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
व्यास उवाच
अय़ं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
अय़ं हि शकुनिर्वेद सविद्यामक्षसम्पदम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अय़ं हि सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं हि सर्वानाहूय़ सत्कृत्य च नराधिपान् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
अय़ं ह्यपि समाहारः शरीरेन्द्रिय़चेतसाम् |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं ह्येषां महावाहुः सर्वेषां शर्म वर्म च |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं ह्यौपय़िको भर्ता तस्याः पुरुषसत्तमः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं हय़ान्वीक्षति मामकान्दृढं; ध्रुवं हय़ज्ञो भविता विचक्षणः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ःकणपचक्राश्मभुशुण्ड्युद्यतवाहवः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अय़ःशरोग्रमकरात्क्षत्रिय़प्रवराम्भसः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ःशिरा अश्वशिरा अय़ःशङ्कुश्च वीर्यवान् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ःशिरा अश्वशिरा अय़ःशङ्कुश्च वीर्यवान् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ःशूलादिभिर्घ्नन्ति राक्षसाः शत्रुसूदन ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अय़च्छत्तुरगान्यच्च फल्गुनं चाप्ययोधय़त् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
अय़जत्तात वहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़जत्स महातेजाः सहस्रं परिवत्सरान् ||
१०७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अय़जद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
अय़जद्यत्र कौन्तेय़ पूर्वमेव पितामहः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़जद्वाजपेय़ेन सोऽश्वमेधशतेन च |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अय़जन्निह सत्रैस्ते तैस्तैः कामैः सनातनैः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
अय़जो भूरितेजा वै कृष्ण चैत्ररथे वने ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ज्ञवाहिनं पापमकार्षीस्त्वं सुदुर्मते ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ज्ञीय़द्रुमे देशे रुरुसिंहनिषेविते |
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
अय़तिः श्रद्धय़ोपेतो योगाच्चलितमानसः |
३७ क