आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
कर्मभूमिरिय़ं भूमिर्यत्र तिष्ठन्ति जन्तवः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मभूमिरिय़ं राजन्निह वार्त्ता प्रशस्यते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
कर्मभूमिरिय़ं लोक इह कृत्वा शुभाशुभम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
कर्मभूमिरिय़ं व्रह्मन्फलभूमिरसौ मता ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
कर्मभोगेन वध्यन्तः क्लिश्यन्ते येऽल्पवुद्धय़ः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
कर्मभ्यो विप्रमुच्यन्ते यत्ताः संवत्सरं स्त्रिय़ः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्ममूर्त्यात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापय़ोः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
कर्मविद्यामय़ावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
कर्मवुद्धिरवुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गैरिवाश्रितम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
कर्मसङ्घर्षजैर्दोषैर्दुष्यत्यशुचिभिः शुचिः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
कर्मसन्ततिमुत्सृज्य स्यान्निरालम्वनः सुखी ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मसाक्षी प्रजानां यस्तेन कालेन संहृताः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मसिद्धौ तदा तत्र जृम्भमाणा महाद्भुता |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
कर्मस्था विषमं व्रूय़ुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
कर्मस्था विषमं व्रूय़ुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
कर्मस्वनुपय़ुञ्जानमविश्वास्यं हि तं विदुः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
कर्मस्विहानुरूपेषु न्यस्या भृत्या यथाविधि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
कर्महेतुपुरस्कारं भूतेषु परिवर्तते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
कर्मागाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमिदं नृप |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
कर्माणि चैव दिव्यानि महादेवस्य धीमतः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
कर्माणि चोदय़न्तीह यथान्योन्यं तथा वय़म् ||
६६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
कर्माणि यानि देव त्वं वाल एव महाद्युते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
कर्माणि वैदिकान्यस्य स्वर्ग्यः पन्थास्त्वनुत्तमः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
कर्माण्यकुहकार्थानि येषां वाचश्च सूनृताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
कर्माण्यपरिमेय़ानि चतुर्मूर्तिधरो ह्यहम् |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
युधिष्ठिर उवाच
कर्माण्यस्य प्रभावं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
कर्माण्यारभते कर्तुं कीनाश इव दुर्वलः ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
युधिष्ठिर उवाच
कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि तानि करिष्यथ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
कर्मातिरेकेण गुरोरध्येतव्यं वुभूषता |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
कर्मात्मा त्वपरो योऽसौ मोक्षवन्धैः स युज्यते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
कर्मानुमन्ता व्रह्मा मे कर्ताध्वर्युः कृतस्तुतिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
कर्मानुमानाद्विज्ञेय़ः स जीवः क्षेत्रसञ्ज्ञकः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मान्तरमुपासन्तो जजल्पुरमितौजसः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
कर्मान्तरेषु विधिवत्सदस्यानां महाकवे ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
कर्मान्तरेष्वकथय़न्द्विजा वेदाश्रय़ाः कथाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
कर्मान्तविहिते लोके चास्तं गच्छति भास्करे |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
कर्मारधौतैर्निशितैर्ज्वलद्भि; र्नाराचमुख्यैस्त्रिभिरुग्रवेगैः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
कर्मारारिष्टशालासु ज्वलेदग्निः समाहितः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हैहय़र्षभ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
कर्मेन्द्रिय़ाणां सर्वेषां विद्या वुद्धीन्द्रिय़ं स्मृतम् |
४ क