वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
अय़स्मय़ा घोररूपा महान्तो; वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अय़स्मय़ो महाचण्डो जगाम धरणीं तदा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
अय़ाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
अय़ाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
अय़ाचं भ्रातृदारेषु तदा व्यासं महामुनिम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
अय़ाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ाचत पशून्दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽव्रवीत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ाचत महात्मानौ नरनाराय़णौ वरम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अय़ाचतः सीदमानान्सर्वोपाय़ैर्निमन्त्रय़ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
अय़ाचतो भय़ं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
अय़ाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ाचन्त च मां राजन्वरं स च मय़ा कृतः |
४० ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
अय़ाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
अय़ाचमानान्कौन्तेय़ सर्वोपाय़ैर्निमन्त्रय़ ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अय़ाचितमसङ्कॢप्तमुपपन्नं यदृच्छय़ा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
अय़ाच्यं चैव याचन्तेऽभोज्यान्याहारय़न्ति च ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़ाच्यमानां च वरैर्नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
अय़ाज्यं क्षत्रिय़ो व्रात्यं सूतं स्तोमक्रिय़ापरम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
अय़ाज्ययाजनं चैव तथाभक्ष्यस्य भक्षणम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
विश्वामित्र उवाच
अय़ाज्यस्य भवेदृत्विग्विसस्तैन्यं करोति यः ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
अय़ातय़ामं सर्वेभ्यो भागेभ्यो भागमुत्तमम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
अय़ातय़ित्वा वैराणि सोऽवसीदति गौरिव ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
अय़ुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
अय़ुक्तः कामकारेण फले सक्तो निवध्यते ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अय़ुक्तः प्राकृतः स्तव्धः शठो नैकृतिकोऽलसः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
अय़ुक्तमिव पश्यामि तिष्ठत्स्वस्मासु मानद |
६६ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुक्तरूपं हि करोति कर्म ते; प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किञ्चन ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
अय़ुक्तामात्मनः पूजां त्वं पुनर्वहु मन्यसे |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुक्ताश्च प्रवर्तन्ते क्षत्रिय़ाणां महारथाः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
अय़ुक्तैस्तव सम्वन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
अय़ुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुतं गा द्विजातिभ्यः प्रादान्निष्कांश्च तावतः ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुतं च पदातीनां रथाः पञ्चशतास्तथा ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
अय़ुतं तत्र योधानां हत्वा पाण्डुसुतो रणे |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
अय़ुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अय़ुतं प्रेषय़ामास पाण्डवानां निवारणे ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
अय़ुतं प्रय़ुतं चैव खर्वं पद्मं तथार्वुदम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुतं भोजय़ामास व्राह्मणानां नराधिपः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ुतनाय़ी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपय़ेमे भासां नाम |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अय़ुतानि च तत्रासन्प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
१३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अय़ुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
अय़ुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय़ मां विभो |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अय़ुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव |
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अय़ुताय़ुतं तथा पद्मं समुद्रं च तथा वसेत् ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अय़ुताय़ुश्च सङ्क्रुद्धो दीर्घाय़ुश्चैव भारत ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अय़ुतेन गजानां च निषादैः सह केतुमान् |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
अय़ुद्धं वै तात युद्धाद्गरीय़ः; कस्तल्लव्ध्वा जातु युध्येत सूत ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
अय़ुद्धं सौम्य भाषस्व हितकामो युधिष्ठिरः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अय़ुद्धमनवस्थानं सङ्ग्रामे च पलाय़नम् |
९६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अय़ुद्धमनसं चैव राजानं स्थितमम्भसि ||
२६ ख