अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामपि रोपणे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सर्वानेव प्रजापतीन् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
जनमेजय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं महात्मानः किमकुर्वन्त पाण्डवाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
अत ऊर्ध्वं महाराज गुणस्यैतस्य तत्त्वतः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
जनमेजय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं महावाहुः किं चकार महाय़शाः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
जनमेजय़ उवाच
अत ऊर्ध्वं महावीर्याः किमकुर्वन्त वै द्विज ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अत ऊर्ध्वं विचित्रार्थं भीष्मपर्व प्रचक्षते |
१५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अत ऊर्ध्वं विसर्गस्य परीक्षां व्राह्मणे शृणु ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणान् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अत ऊर्ध्वमिदं प्राहुः स्त्रीपर्व करुणोदय़म् |
१९१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
तापसा ऊचुः
अत एतानि वर्ज्यन्ते तीर्थानि कुरुनन्दन ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
अत एतानि सर्वाणि कारणानि समीक्ष्य वै |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अत एतैर्वलैरेते वलिनः स्वार्थमिच्छता |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
अत एव च पूर्वेषां पूर्वामाशामवेक्षताम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
अत एव भय़ं नास्ति क्रिय़तां वचनं मम ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अत एव हि सिद्धिस्ते नेशस्त्वमात्मना नृप ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
अत एवंविधा विप्राः पुराणा धर्मचारिणः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
अत एषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरोऽद्य सन् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अतः कर्णः प्रय़ात्वत्र सात्वतस्य यथा तथा |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
अतः कष्टतरं किं नु मत्कृते यत्पितामहः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अतः किल महानग्निरन्तकाले समुत्थितः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अतः कूपे पतित इति ||
५७ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं कर्णपर्व प्रोच्यते परमाद्भुतम् |
१६९ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
जनमेजय़ उवाच
अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः; समेत्य शूरेण धनञ्जय़ेन ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
अतः परं च देशोऽय़ं दक्षिणे दक्षिणापथः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
अतः परं च यद्गुह्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
अतः परं चारिणी स्यात्पञ्चमे वन्धकी भवेत् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अतः परं ज्ञानवतां निवोध गतिमुत्तमाम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अतः परं तु गोदानं कीर्तय़िष्यामि तेऽनघ ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
अतः परं तु विज्ञेय़ो निषादो धैवतस्तथा ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं तृतीय़ं तु ज्ञेय़मारण्यकं महत् |
१०५ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अतः परं त्वहं वै त्वां दर्शय़े भरतर्षभ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
जनमेजय़ उवाच
अतः परं द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं निवोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् |
२२० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं निवोधेदं वैराटं पर्वविस्तरम् |
१३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
अतः परं परममुदारमाश्रमं; तृतीय़माहुस्त्यजतां कलेवरम् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि तृतीय़ं गुणमुत्तमम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूतानामादिमुत्तमम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगानामपि दर्शनम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोर्यथा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं त्रिविधमिन्द्रिय़म् ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि सौप्तिकं पर्व दारुणम् |
१७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
युधिष्ठिर उवाच
अतः परं महावाहो यच्छ्रेय़स्तद्वदस्व मे |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
अतः परं मय़ा कार्यं क्षुद्रं विजय़गृद्धिना |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् |
१७३ क