chevron_left  अतर्पय़न्महावाहुरर्जुनोarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अतर्पय़न्महावाहुरर्जुनो जातवेदसम् |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
अतश्च त्वां व्रवीम्येतत्क्रिय़तामविशङ्कय़ा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्च धर्मिभिः पुम्भिरनीहार्थः प्रशस्यते |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
अतश्च प्रहितो युद्धे मय़ा कर्णाय़ राक्षसः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्च सर्वे संवृत्ता गिरय़ः काञ्चनाकराः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
अतश्च सर्वेऽपि वसुन्धराधिपा; हता गमिष्यन्ति महात्मनां गतिम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अतश्चान्यन्मतिमान्सन्दधीत; तस्माद्राजा वुद्धिमन्तं श्रय़ेत ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
अतश्चाष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् |
९९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
अतश्चाय़ोगवं सूते वागुरावनजीवनम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चेदन्यथा कर्ता धार्तराष्ट्रोऽनुपाय़वित् |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चैनं प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप |
७७ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजाः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतलक्षणः |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अतसीपुष्पसङ्काशं पीतवाससमच्युतम् |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
अतसीपुष्पसङ्काशं पीतवाससमच्युतम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अतसीपुष्पसङ्काशः पीतवासा जनार्दनः |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
अतस्तत्त्वानि वक्ष्यामि याथातथ्येन हेतुना |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
वदान्य उवाच
अतस्तदिष्टं देवस्य तथोमाय़ा इति श्रुतिः ||
२० ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अतस्तवाक्षय़ा लोकाः स्वशरीरेण भारत |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अतस्तु भूतान्यन्यानि कीर्तय़िष्यामि भारत |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अतस्ते निय़मं वित्ते सम्प्रवक्ष्यामि भारत ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वय़मागमत् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९३
धृतराष्ट्र उवाच
अतस्तेषां गुणानेव कीर्तय़ामि विशेषतः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
अतस्त्वं देव देवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठितः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अतस्त्वां कथय़े कर्ण निदर्शनमिदं पुनः ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
अतस्त्वां क्लीववद्वाक्यं व्रवीमि कुरुनन्दन |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
कृप उवाच
अतस्त्वां क्लीववद्व्रूमि युद्धादन्यत्किमिच्छसि ||
६७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
अतस्त्वां क्लीववद्व्रूमो युद्धादन्यत्किमिच्छसि |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
अतस्त्वां स्वय़मेवाहं द्रष्टुमभ्यागतो द्विज ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
शर्मिष्ठो उवाच
अतस्त्वामनुय़ास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
अताडय़ं शरेणाथ तद्भूतं लोमहर्षणम् ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अताडय़ंस्तथाभञ्जंस्तथामृद्नंश्च भारत ||
९२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अताडय़च्छङ्खदेशे स चचालाचलोपमः ||
५८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अताडय़च्छतानीकं मुक्तचक्रं द्विजस्तु सः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अताडय़च्छत्रुममित्रकर्शनो; वलेन विक्रम्य धनञ्जय़ाग्रजः ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अताडय़त्पाण्डवमग्रतः स्थितं; स विह्वलाङ्गो जगतीमुपास्पृशत् ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
अताडय़दमेय़ात्मा नवभिः कङ्कपत्रिभिः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अताडय़द्भीमसेनः पार्श्वे दुर्योधनं तदा |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अताडय़द्रणे शूरो जत्रुदेशे नरोत्तमः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
अताडय़न्रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जय़ाः ||
३ ग
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
अतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशां पते |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अतापय़च्छरव्रातैर्गभस्तिभिरिवांशुमान् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
अतापय़त्सैन्यमतीव भीमः; काले शुचौ मध्यगतो यथार्कः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वय़म्प्रभा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३६
यवक्रीरु उवाच
अति चान्यान्भविष्यावो वरा लव्धास्तथा मय़ा ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
अति चान्यान्रणे योधान्वीरः पुरुषसत्तमः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अति दानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
अति धर्माद्वलं मन्ये वलाद्धर्मः प्रवर्तते ||
५ ख