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आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
अति नक्षत्रवंशांश्च क्रुद्धो नक्षत्रसम्पदा |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्यति पाण्डवः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अति भूतानि तं शव्दं मेनिरेऽति च विव्यथुः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अति मा नन्दय़त्येष सौभद्रो विचरन्रणे |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अति यज्ञविदां चैव क्षमिणः प्राप्नुवन्ति तान् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अति युद्धानि सर्वाणि युद्धमेतत्ततोऽधिकम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अति व्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अति सर्वाणि भूतानि ददृशुः सर्वमानवाः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
अति सर्वाण्यनीकानि पिता तेऽभिव्यरोचत ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अति सर्वान्धनुर्ग्राहान्सूतपुत्रस्य लाघवम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अति स्विष्टस्वधीतानां लोकानति तपस्विनाम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
अतिकर्मा प्रतीतश्च प्रदाता चांशुमांस्तथा |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
अतिकाय़ः स तेजस्वी लोकसारविनिर्मितः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
अतिकाय़श्च पुत्रस्ते वालोऽपि वलवानय़म् |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
अतिक्रमं मे भगवन्क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
अतिक्रमे मज्जमानो विविधेन नरः सदा |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अतिक्रमेच्च माहात्म्याद्दिष्टमेतस्य पर्ययात् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
अतिक्रमेत नृपतिः सङ्ग्रामे क्षत्रिय़ात्मजम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अतिक्रमो मद्विधस्य कथं स्वित्स्यादनिन्दिते ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ||
४३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
अतिक्रम्य वहूनन्यांस्त्वय़ि तावदिय़ं स्थिता ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
अतिक्रम्य ससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
अतिक्रम्याभ्यतिक्रम्य ससारैव वने चरन् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अतिक्रान्तं हि यत्कार्यं पश्चाच्चिन्तय़तीति च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
देवय़ान्यु उवाच
अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत्कथय़ामि ते ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
अतिक्रान्तसुखाः कालाः प्रत्युपस्थितदारुणाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् |
९५ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अतिक्रान्ताश्च वहवः प्रादुर्भावा ममोत्तमाः |
९५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अतिक्रान्ते च लोकानामभावो निय़तो भवेत् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अतिक्रान्ते हि कौन्तेय़े भित्त्वा सैन्यं परन्तप |
८ क
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिक्रान्तेन वय़सा सन्तापमुपजग्मिवान् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
अतिक्रान्तोऽमृतस्यार्थे सर्वतोऽग्निमपश्यत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
युधिष्ठिर उवाच
अतिक्रामति कालेऽस्मिन्सर्वभूतक्षय़ावहे |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
अतिक्रामति यः शास्त्रं पितुर्धर्मार्थदर्शिनः ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अतिक्रामन्केशवस्य तथ्यं वचनमर्थवत् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिक्रामन्नरण्यानि ग्रामांश्च नगराणि च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
अतिक्रामेन्न पक्षी यान्कुत एवेतरे मृगाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १८
सूत उवाच
अतिक्रूरं समुद्दिष्टं कद्र्वा दैवादतीव हि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
अतिक्लेशान्सहामीह नाहं वुध्याम्यवुद्धिमान् |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण च |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अतिक्षिप्तान्व्यतिक्षिप्तान्विहतान्प्रतनूकृतान् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
अतिगृद्धाः कृतस्नेहा दीर्घकालं सहोषिताः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अतिचक्राम लोकान्स राज्ञां राजीवलोचनः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
अतिचक्राम सुमहान्कालोऽथ भरतर्षभ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
अतिच्छेदातिवादाभ्यां स्मय़ोऽय़ं समुपागतः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अतिडीनं महाडीनं निडीनं परिडीनकम् ||
२५ ख