वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अतिवेलं हि योऽर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
अतिवेलमुपाश्नाति तैर्विरुद्धान्यनात्मवान् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अतिशक्त्या पितृनर्चन्देवांश्च प्रय़तः सदा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
अतिशक्त्या प्रय़च्छन्ति सन्तः सद्भिः समागताः ||
८५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अतिशक्रमिदं सत्त्वं तवेति प्रतिभाति मे ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
अतिशङ्का भवेत्स्थाने तव लोकस्य चाभिभो ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिशङ्क्य वचो ह्येतद्धर्मलोपो भवेत्तव ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अतिशेते हि यत्र त्वा द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ||
१२३ ग
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
अतिशेते हि वै वाचं कर्मेति प्रथितं भुवि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
अतिष्ठ एकपादेन वाय़ुभक्षः शतं समाः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षितः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
भीष्म उवाच
अतिष्ठत गय़ां गत्वा सोऽङ्गुष्ठेन शतं समाः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ||
५६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत रणे वीरः क्रुद्धरूप इवान्तकः ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत्तुमुले भीमः श्मशान इव शूलभृत् ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत्तुमुले भीमो गिरिर्मेरुरिवाचलः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठत्प्राञ्जलिः प्रह्वः किं करोमीति चाव्रवीत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
अतिष्ठत्सुवहून्कालानेकदेशे विशां पते ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अतिष्ठत्सूर्यतापार्ता कर्णस्योत्तरवाससि |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अतिष्ठत्सूर्यमभितो यतो याति ततोमुखः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
अतिष्ठत्स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूम इव पावकः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
८३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु ||
७३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठदाहवे यत्तः पुत्रस्तव महावलः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठदाहवे शूरः किरन्वाणान्सहस्रशः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसन्ततः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
अतिष्ठदेकपादेन वर्षाणां शतमच्युत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
अतिष्ठदेकपादेन सहस्रं परिवत्सरान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठद्युगमध्ये स युगसंनहनेषु च |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठद्रथमार्गेषु सैन्धवं परिपालय़न् ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठन्त मुहुः सर्वे पाण्डवाः सात्यकिस्तथा ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठन्नार्यवद्वीराः प्रार्थय़न्तो महद्यशः ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठन्व्रीडिताश्चैव ह्रिय़ा युक्ता ह्यधोमुखाः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
अतिष्ठन्समरे शूरा योद्धुकामा जय़ैषिणः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणाति युधिष्ठिरे ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनञ्जय़ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
अतिहर्षोऽय़मस्थाने तवाद्य मधुसूदन |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जय़े |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
अतिह्रस्वातिदीर्घाश्च प्रवलाश्चातिभैरवाः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
अतिय़ोगमय़ोगं च श्रेय़सोऽर्थी परित्यजेत् ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी; राजा विनिःश्वस्य वभूव तूष्णीम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
अतीतकाले दुर्भिक्षे यत्रैत्य पुनराश्रमम् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
अतीतक्रोधसन्तापा निय़ता धर्मसेतवः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
अतीतपात्रसञ्चारे काले विगतभिक्षुके ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
अतीतपात्रसञ्चारे काले विगतभैक्षके ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषा किल ||
३६ ख