आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
अतीव तपसात्मानं योजय़िष्याम्यसंशय़म् ||
६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
अतीव तव सैन्यस्य पार्थेन च महात्मना |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
अतीव ते महत्कर्म कृतं वलवतां वर |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
अतीव तेषां घृणिनामर्थेऽहं धर्मचारिणी |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
अतीव दुःखभागी स सततं कुन्तिनन्दनः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
उमा उवाच
अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
अतीव दुःखसन्तप्ता दासीभावमुपागता ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव दुःखसन्तप्ता न शमं चोपलेभिरे ||
६ ग
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव पाण्डवो भीष्मं भीष्मश्चातीव पाण्डवम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
अतीव पुण्यास्ते भागाः सलिलस्य च तेजसा ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव प्रेक्षणीय़ोऽभून्मेरुर्मुनिगणैरिव ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
अतीव मदमत्तस्त्वं न कञ्चिन्नावमन्यसे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव मनसा शोकः क्रिय़माणो जनाधिप |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
अतीव मुखवर्णोऽस्य निहतस्यापि शोभते |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव मुदिता राजन्भीमसेनमथाव्रवीत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
३० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अतीव मुदितो राजन्युद्धप्रेप्सुर्युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोंऽशुमानिव |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अतीव मोहमाय़ाति मनश्च परिदूय़ते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
अतीव रमणीय़ं तदतीव च मनोहरम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवाय़तलोचना ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रिय़मिवापराम् ||
३८ ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव रूपसम्पन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम् |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
अतीव रूपसम्पन्नो न किञ्चिदवमन्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
अतीव रूपेण समन्विता त्वं; न चाप्यरण्येषु विभेषि किं नु |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
अतीव वासवस्यासीद्वलमुत्तमतेजसः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
अतीव विजय़ो धीमानिति मे दूय़ते मनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिताः शैलसानुषु ||
६७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
अतीव वृद्धा वहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
अतीव शुभ्रं वदनं पश्य कृष्ण विविंशतेः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अतीव शुशुभे तत्र पिता ते पूर्णचन्द्रवत् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
अतीव शुश्रुवे राजन्गाण्डीवस्य महास्वनः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
अतीव संशय़च्छेत्ता भवान्वै प्रथितः क्षितौ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अतीव सञ्ज्ञाय़ते ज्ञातिमध्ये; महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः ||
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अतीव सम्प्रहृष्टांस्तानुपलभ्य धनञ्जय़ः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अतीव सर्वान्पुत्रांस्ते भागधेय़पुरस्कृतः |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
अतीव सा निशा तेषां वभूव विजय़ावहा |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
अतीव सुकुमाराङ्गीं तनुमध्यां सुलोचनाम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अतीव हि महान्यत्नः क्रिय़तेऽय़ं निरर्थकः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अतीव हृष्टाः श्वसृगालवाय़सा; वडाः सुपर्णाश्च वृकास्तरक्षवः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अतीव हृष्टो दाशार्हमव्रवीत्पाकशासनिः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
अतीव ह्यत्र मुह्यामि चिन्तय़ानो दिवानिशम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अतीव ह्यस्य धर्मेप्सा पितुर्मेऽभ्यधिकाभवत् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
अतीवगुणवत्सर्वं तत्र पुण्यं जनाधिप ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अतीवावहिता द्रष्टुं कर्णशैनेय़यो रणम् ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
अतुलं हि वलं तस्य वृहस्पतिरुवाच मे ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अतुलः शरभो भीमः समय़ज्ञो हविर्हरिः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
अतुला कीर्तिरभवन्नृपस्य द्विजसत्तम |
८ ख